Editorial
Date : 25 March 2026
किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति केवल कूटनीतिक दस्तावेजों या उच्चस्तरीय बैठकों तक सीमित नहीं होती; यह उस राष्ट्र की सामूहिक नियति का निर्माण करती है। जब विदेश नीति दूरदर्शिता, संतुलन और राष्ट्रीय हितों की स्पष्ट समझ पर आधारित होती है, तब वह देश को वैश्विक मंच पर सशक्त बनाती है। लेकिन जब यही नीति असंतुलित, प्रतिक्रियाशील या बाहरी दबावों के अधीन हो जाती है, तो उसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है। आज का वैश्विक परिदृश्य बहुध्रुवीय और अस्थिर है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया की अस्थिरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान ने विश्व व्यवस्था को जटिल बना दिया है। ऐसे समय में विदेश नीति केवल ‘दोस्ती’ या ‘दुश्मनी’ का प्रश्न नहीं रह जाती, बल्कि यह रणनीतिक संतुलन का विज्ञान बन जाती है।
भारत की स्थिति इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण है। भारत ने परंपरागत रूप से गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की नीति को अपनाया है। वर्तमान समय में भी भारत ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ की नीति के तहत अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ संतुलित संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है।एक ओर भारत क्वाड (QUAD) जैसे मंचों के माध्यम से अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ सामरिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस से ऊर्जा और रक्षा सहयोग बनाए हुए है। यह संतुलन भारत के लिए आवश्यक भी है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने तटस्थ रुख अपनाया और रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदा, जिससे घरेलू स्तर पर ऊर्जा संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सका। यह एक व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों पर आधारित निर्णय था। लेकिन इसके कारण पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में सूक्ष्म दबाव भी उत्पन्न हुए।
इसी प्रकार, चीन के साथ सीमा विवाद और आर्थिक प्रतिस्पर्धा भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। एक ओर भारत चीन के साथ व्यापारिक संबंध बनाए रखता है, वहीं दूसरी ओर सीमाओं पर तनाव और सामरिक सतर्कता भी बनाए रखनी पड़ती है। इस द्वंद्व का प्रभाव सीधे भारतीय बाजार, उद्योग और रोजगार पर पड़ता है। पड़ोसी देशों के संदर्भ में भी भारत की विदेश नीति मिश्रित परिणाम देती दिखाई देती है। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और मालदीव के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव यह दर्शाते हैं कि क्षेत्रीय कूटनीति में निरंतर सक्रियता और संवेदनशीलता आवश्यक है। यदि भारत अपने पड़ोस में स्थिरता और विश्वास कायम नहीं कर पाता, तो इसका लाभ बाहरी शक्तियाँ उठाती हैं, जिसका दीर्घकालिक असर भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।इन सभी परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि भारत की विदेश नीति एक कठिन संतुलन साधने का प्रयास है—जहाँ हर निर्णय के बहुआयामी प्रभाव होते हैं। यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो उसके परिणाम केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित नहीं रहते। महँगाई, ईंधन की कीमतें, रक्षा व्यय में वृद्धि, व्यापारिक असंतुलन और रोजगार के अवसरों में कमी—ये सभी संकेत हैं कि विदेश नीति का सीधा प्रभाव आम जनता के जीवन पर पड़ता है। अतः यह आवश्यक है कि भारत अपनी विदेश नीति को केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ या वैश्विक दबावों के आधार पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों और जनता के कल्याण को केंद्र में रखकर संचालित करे। अंततः, एक सफल विदेश नीति वही है जो वैश्विक मंच पर देश की गरिमा को बनाए रखते हुए अपने नागरिकों के जीवन को सुरक्षित, समृद्ध और स्थिर बनाए। अन्यथा, असफल विदेश नीति का खामियाजा हमेशा जनता को ही भुगतना पड़ता है—और यही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना है। अतः स्पष्ट है कि असफल विदेश नीति का वास्तविक बोझ आम जनता ही उठाती है।
Pulastey, R. A. (2026). असफल विदेश नीति का खामियाजा जनता भुगतती है: भारत के संदर्भ में. Eastern Scientist.
https://www.easternscientist.in/foreign-policy-editorial
डॉ. अचल पुलस्तेय एक प्रख्यात लेखक, शोधकर्ता एवं विचारक हैं, जो सामाजिक, ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक विमर्शों पर सक्रिय लेखन करते हैं।
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