लोक गीतों के संदर्भ में अथर्ववेद का अनुशीलन: प्रेम और लोक-तत्वों के विशेष संदर्भ में

A Study of Atharvaveda in the Context of Folk Songs

Eastern Scientist | www.easternscientist.in

Print ISSN: 2581-7884 | ISSN-L: 2581-7884 | Volume I | Issue 35 | April–June 2026
RESEARCH ARTICLE
डॉ. रति सक्सेना1
1 1 के.पी. 9/624, वैजयन्त, चेट्टिकुन्नु, तिरुवनन्तपुरम् - 695011
*Corresponding Author: editorkritya@gmail.com
DOI :
ABSTRACT

In Indian literature, the Vedas are often perceived primarily as spiritual and philosophical treatises. However, the Atharvaveda stands out as a text that is most closely aligned with the 'folk' (Loka). It encompasses the natural outpouring of the common man’s joys, sorrows, love, and physical desires. This research paper analyzes the lyricism, rhythm, and folk sensibilities inherent in selected hymns (Richas) of the Atharvaveda, establishing them as the ancestral roots of modern folk songs.

Keywords: Atharvaveda, Folk Songs (Lok Geet), Folk Sensibilities, Love Hymns, Lyricism, Ancient Indian Literature, Vedic Culture, Madhujata.
सारांश

भारतीय वाङ्मय में वेदों को प्रायः केवल आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथों के रूप में देखा जाता है। किन्तु अथर्ववेद एक ऐसा ग्रंथ है जो 'लोक' के सर्वाधिक निकट है। इसमें जनसामान्य के हर्ष, विषाद, प्रेम और दैहिक कामनाओं का सहज प्रस्फुटन मिलता है। प्रस्तुत शोध-पत्र अथर्ववेद की चुनिंदा ऋचाओं में निहित गेयता, लयात्मकता और लोक-संवेदनाओं का विश्लेषण करता है, जो इसे आधुनिक लोक गीतों का पूर्वज सिद्ध करते हैं।

कूट शब्द: अथर्ववेद, लोक गीत, लोक-संवेदना, प्रेम सूक्त, ऋचाएँ, गेयता, सांस्कृतिक विरासत, मधुजाता।
1.प्रस्तावना Introduction

लोक के भावों में निर्झर की तरह प्रस्फुटन शक्ति होती है, यही कारण है कि उनमें वेग, तारतम्य और लयात्मकता होती है। लोक लेखनी की अपेक्षा वाणी का प्रयोग अधिक करता है। यही कारण है कि लोक में गीतात्मक अभिव्यक्तियाँ अधिक होती हैं। सुख हो या दुख, वेदना हो या प्रसन्नता, काम हो या थकान, लोक गीतों में अभिव्यक्ति देता है। वैसे तो वैदिक मंत्रों में गीतात्मकता व लयात्मकता स्वाभाविक तौर पर है, किन्तु अथर्ववेद में ऐसे अनेक ऋचाएँ मिलती हैं जिनमें लोकगीतों की तीव्रता है। इन गीतों से ऐसा लगता है कि वे लोक के व्यक्ति ही नहीं समष्टि की पूर्ण अभिव्यक्ति देने में समर्थ हैं। कुछ गीत सामूहित रूप में गाए जाते रहे होंगे तो कुछ व्यक्ति विशेष द्वारा। इन लोक गीतों पर विशेष रूप से दृष्टि डालने की आवश्यकता है।

2. अथर्ववेद में लोक-तत्व और मधुरता की कामना

अथर्ववेद में अनेक मंत्र ऐसे मिलते हैं जिनकी लोक प्रेम गीतों से तुलना की जा सकती है, लोक में प्रचलित प्रेम गीतों में जो उत्कटता, तीव्रता और निश्च्छल प्रेम होता है वह सब इन मंत्रों में मिलता है। इन मंत्रों के लोक तत्वों की विवेचना की जाए तो वेदों सम्बन्धी एक बहुत बड़ी भ्रान्ति का निवारण हो सकता है। निम्नलिखित गीत मधुजाता औषध को उखाड़ते वक्त गाया जाता होगा। इस औषध का उपयोग वाण को मधुर बनाने के लिए किया जाता रहा होगा। युवकों के समक्ष वाणी व व्यक्तित्व को मधुर बनाना प्रिया के हृदय जीतने के लिए जरूरी था। ये गीत मांत्रिक शक्ति रखते हुए भी लोक गीत के अधिक निकट है। लोक में अपने साथी वनस्पतियों और जानवरों को सहयोगी के रूप में देखने की भावना अधिक होती है।

अथर्ववेद में अनेक मंत्र ऐसे मिलते हैं जिनकी लोक प्रेम गीतों से तुलना की जा सकती है, लोक में प्रचलित प्रेम गीतों में जो उत्कटता, तीव्रता और निश्च्छल प्रेम होता है वह सब इन मंत्रों में मिलता है। इन मंत्रों के लोक तत्वों की विवेचना की जाए तो वेदों सम्बन्धी एक बहुत बड़ी भ्रान्ति का निवारण हो सकता है। निम्नलिखित गीत मधुजाता औषध को उखाड़ते वक्त गाया जाता होगा। इस औषध का उपयोग वाण को मधुर बनाने के लिए किया जाता रहा होगा। युवकों के समक्ष वाणी व व्यक्तित्व को मधुर बनाना प्रिया के हृदय जीतने के लिए जरूरी था। ये गीत मांत्रिक शक्ति रखते हुए भी लोक गीत के अधिक निकट है। लोक में अपने साथी वनस्पतियों और जानवरों को सहयोगी के रूप में देखने की भावना अधिक होती है।

  • इयं वीरुन्मधुजाता मधुना त्वा खनामसि। मधोरधि प्रजातास सा नो मधुमतस्कृधि।।
  • जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्।ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि।।
  • मधुमन्मे निष्क्रमणं मधुमन्मे परायणम्। वाचा दामि मधुमर भूयांसं मधुसंदृशः।।
  • मधोरस्मि मधुतरो मदुधान्मधुमत्तरः । मामित् किल् त्वं वनाः शाखां मधुमतीमिव।।
  • परि त्वा परितत्नुनेक्षुणामामविद्विषे। यथा मां कामियन्सो यथा मन्नपगा असः।।
  • अथर्व,1/34/1,2,3,4,5

    हिन्दी रूपान्तरण

    • मधुर-मधुर,
    • मधुतर, मधु
    • उत्तम
    • मधुमास में उत्पन्न
    • मधुजाता औषध!
    • तेरा खनन करता मैं मधुहित
    • तू मधुर, मुझे कर
    • मधुमय
    • जिह्वाग्र मधुर
    • जिह्वामूल मधुर
    • समग्र बोली मधुर
    • चिन्तन भी हो इतना मधुर कि
    • करे वह उपासना मेरे चित्त की
    • मधुर मेरा आना-जाना
    • मधुमय उठना- बैठना
    • हे मधुमती! वनों में
    • पेड़ो की शाखाओं पर तुम दीखती मधुर ज्यों
    • मेरा व्यक्तित्व भी हो मधुर वही
    • अभिसिंचित करो ईख-रस सम मधु से
    • प्रिया प्यार करे इतना कि
    • सह न पाए कभी मुझसे दूरी
    • ओ मधुर मधुतम औषध!
    • मधुर बना प्रिया हित तू मुझे..

    3. प्रेम का मनोविज्ञान और मानवीकरण

    निम्न लिखित गीत काम मत्त प्रेमी द्वारा गया गीत है, जो दैविक शक्तियों का आह्वान करता हुआ प्रेमिका के चित्त को पूरी तरह से जीतना चाहता है।

    अथर्ववेद (2/30/1-5)

    • यथेदं भूम्या अधितृणं वातो मथायति।
    • एवा मथ्नामि ते मनो यथा मां कामिन्यसो मथा मन्नपगा असः।।
    • सं चेन्न्याथो अश्विना कामिनासं चं वक्षथः।
    • सं वां भगासो अग्मत सं चित्तानि समुव्रता।।
    • यत् सुपर्णा विपक्षवो अजमीवा विवक्षवः।
    • तत्र मे गच्छाद्दवं शल्य इव कुल्मलं यथा।।
    • यदन्तरं तद् बाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्।
    • कन्यायां विश्वरूपानां मनो गृभायौषधे।।
    • एयमगनपतिकामा जनिकामोच्हयागमम्।
    • अश्वः कनिक्रदद् यथा भगनाहं सहागमम्।।

    हिन्दी रूपान्तरण

    • ज्यों हवा बहती
    • वन जन जनपद
    • मथती जाती तिनका-तिनका
    • मैं भी करूँ प्रिया मन-मंथन
    • तू करे कामना मेरी प्रियतमा बन
    • न सहे कभी मुझसे दूरी
    • हे अश्विन कुमारों!
    • तुम्हारे प्रेरण से हम प्रेमी
    • साथ चले
    • आगे बढ़े
    • सम भाव से
    • मन से मन मिलाते
    • सम नियम-धर्मों का
    • पालन करते-करते
    • सुनहर- पंछी को बींधता ज्यों शर
    • मेरे प्रेम-बाण भी करें
    • कामिनी का मन छेदन
    • छिपे भाव उमगे बाहर
    • बाहर का प्रेम मन के भीतर
    • बाहर -भीतर , भीतर -बाहर
    • मुझे दीखती प्रिया विश्वरूपा
    • यह देखो आई प्रिया
    • ले मन में पति कामना
    • मैं भी आता हूँ हींसते घोड़े सा
    • बने सुखद हमारा समागम
    • मन का मन से मिलन
    • तन का तन से सहागम!

    4. प्रकृति और देह का तादात्म्य

    प्रतीकों का सटीक और सजीव प्रयोग लोक गीतों की आत्मा है। निम्नलिखित गीतों में प्रेम की तीव्रता लोकगीतो की समस्त विशेषताओं को प्रस्तुत करती है। प्रेमी प्रिया की शिथिलता को बरदाश्त न करते हुए उसे पूरी तरह से प्राप्त करने की कामना करता है-

    अथर्ववेद (3/25/1-5)

    • उत्तुदस्त्वोत् तुदतु मा धृथाः शयने स्वे।
    • इषुः कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि।।
    • आधीपर्णां कामशल्यामिषुं सं कल्पकुल्मलाम्।
    • तां सुंसवतां कृत्वा कामों विध्यतु त्वा हृदि।।
    • या प्लीहानं शोषयति कामस्येषुः सुखन्नता।
    • प्राचीन पक्षा व्योषा तया विध्यामि त्वा हृदि।।
    • शुचा विद्धा व्योषया शुष्कास्यामि सर्प मा।
    • मदुरनिमन्युः केवली प्रियवादिन्नुव्रता।।
    • आझामि त्वाजन्या पर मातुरथो पितुः।
    • यथा मम क्रतावसो ममचित्तमुपायसि।।

    हिन्दी रूपान्तरण

    • उठ बैठ प्रिया!
    • मत सोती रह
    • तुझे उठाता मैं प्रेमी
    • बींधता तेरा हृदय
    • काम के भीम तीर से
    • यह मेरा काम- तीर
    • प्रतिष्ठित हैं इसके पर
    • संकल्पों के कुल्मल पर
    • कामना की नोक लगा
    • तीखा कर धार-धार
    • भेदता तेरा हृदय
    • पुरातन पर वाले
    • तीक्ष्ण काम- बाण से
    • सुखाता हूँ तेरा जिगर
    • और हृदय भी
    • तू शुचिता,हृदविद्धा
    • चली आ, चली आ
    • मृदुल मन रख,
    • क्रोध रहित हो
    • मीठा-मीठा बोलती
    • मेरे पास चली आ
    • पाया मैंने तुझे
    • माता और पिता से
    • मेरे कर्म मे रत रह
    • मेरे चित्त में पहुँच
    • बस अनुकरण कर मेरा
    • चली आ चली आ
    • अरी प्रिया मत सोती रह
    • चली आ कामना ले मन में..।

    5.लता और वृक्ष का रूपक

    अथर्ववेद (6/8/1,2,3)

    • यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे।
    • एवा परिष्वजस्वयां यथा मां कामिन्यासे यथा मन्नपगा असः।।
    • यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहन्ति भूम्याम्।
    • एवा नि हन्मि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगाः असः।।
    • यथेम द्यावापृथिवी सद्यः पर्येति सूर्यः एव पर्येमि ते।
    • मनो यथा मां पृथिवी सद्यः सूर्यः एवा पर्येमि ते।
    • मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नपगाः असः।।

    हिन्दी रूपान्तरण

    • प्रिया आ
    • मत दूर जा
    • लिपट मेरी देह से
    • लता लतरती ज्यों पेड़ से
    • मेरे तन के तने पर
    • तू आ टिक जा
    • अंक लगा मुझे
    • कभी न दूर जा।
    • पंछी के पंख कतर
    • ज़मी पर उतार लाते ज्यों
    • छेदन करता मैं तेरे दिल का
    • प्रिया आ, मत दूर जा।
    • धरती और अम्बर को
    • सूरज ढ़क लेता ज्यों
    • तुझे अपनी बीज-भूमि बना
    • आच्छादित कर लूँगा मैं तुरन्त
    • प्रिया आ, मन में छा जा
    • कभी न दूर जा,
    • आ प्रिया!

    2.दैहिक आकर्षण और समर्पण

    अथर्ववेद (6/9/1,2)

    • वाञ्छ मे तन्वं पादौ वाञ्छ सक्थ्यौ।
    • अक्ष्यौ वषण्यन्त्याः केशा मां ते कामेन शुष्यन्तु।।
    • मम त्वा दोषणिश्रिषं कृणोमि हृदयश्रियम्।
    • यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि।।

    हिन्दी रूपान्तरण

    • कामिनी !
    • कर कामना मेरी देह की
    • मेरी जंघाओं की
    • और नेत्रों की
    • अपने मतवाले नेत्रों से
    • घने- लहराते केशों से
    • काम-ज्वरित करती तू
    • मुझे जलाती रह
    • आ, स्वयं
    • कामोद्दीपा
    • मेरे तन की कामना करती प्रिया
    • बाहुओं पर टिका तुझे
    • अंक-अंक भर लेता हूँ
    • तू आ
    • तनिक विश्राम कर मेरे दिल में
    • मेरी क्रियाओं में
    • रत-मन हो
    • मेरे मन में बस जा
    • ओ कामिनी
    • कामना कर मेरे तन की....।

    5. निष्कर्ष (Conclusion)

    अथर्ववेद का यह अनुशीलन सिद्ध करता है कि वेद केवल ऋषियों की अंतर्मुखी साधना के सूत्र नहीं, बल्कि लोक-मानस के बहिर्मुखी उल्लास के जीवंत दस्तावेज हैं। इन मंत्रों में निहित भाव-तीव्रता, प्रकृति-साहचर्य और मानवीय संवेदनाएँ इन्हें आधुनिक लोक गीतों के 'आदि रूप' के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। यदि इन लोक-तत्वों का व्यापक अकादमिक विवेचन किया जाए, तो वेदों के प्रति व्याप्त यह भ्रांति स्वतः समाप्त हो जाएगी कि वे केवल दुरूह कर्मकांडों के ग्रंथ हैं। वस्तुतः, अथर्ववेद का 'लोक' ही आधुनिक लोक-जीवन की सुदृढ़ नींव है।

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