Public Discourse
Date :9 April 2026
Author : अचल पुलस्तेय
War, Sovereignty, and the Shifting Geopolitical Equations: A Discourse
This article frames the recent Israel-Iran-USA conflict not merely as a military clash, but as a strategic milestone shaping future global equations. According to the author, the conflict was fueled by a combination of Israel's religious expansionist ambitions and America’s 'Greater Middle East' agenda, which aimed to dismantle Iran to encircle rivals like Russia and China. Despite decades of sanctions, Iran offered unexpected resistance through its 'Asymmetric Technological Superiority' (indigenous drones, underground missile cities) and the strategic backing of Russia and China. As the United States sought an 'honorable exit' from this deepening quagmire, Pakistan seized the opportunity to act as a diplomatic mediator, attempting to rehabilitate its international image. The author critically examines Indian foreign policy, arguing that India remained preoccupied with domestic electoral narratives, allowing its leadership mantle in South Asia to slip. While smaller neighbors like Sri Lanka, Nepal, and Bangladesh displayed sovereignty through bold and independent decisions, India appeared sidelined due to strategic inertia. Conclusion: This conflict serves as evidence that the world is moving toward multipolarity. History will judge this period not just by the ceasefire, but by identifying those nations that failed to grasp the global pulse and remained on the margins due to a lack of timely, decisive action.
युद्ध और विराम की तात्कालिक परिणति चाहे जो भी हो, इतिहास अपनी व्याख्या के लिए केवल वर्तमान के साक्ष्यों का मोहताज नहीं होता। वह समय की उन गहरी परतों के नीचे दबे स्वार्थों, रणनीतियों और संघर्षों को टटोलता है, जो किसी राष्ट्र की नियति और वैश्विक व्यवस्था की दिशा तय करते हैं। हालिया इज़राइल-ईरान-अमेरिका संघर्ष और उसके बाद उपजी युद्ध विराम की स्थिति को इसी वृहद ऐतिहासिक और रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। यह केवल एक सैन्य टकराव नहीं था, बल्कि विचारधाराओं, संप्रभुता और वर्चस्व की एक ऐसी लड़ाई थी जिसने भविष्य के वैश्विक समीकरणों की नींव रख दी है।
इस युद्ध के केंद्र में इज़राइल की विस्तारवादी धार्मिक महत्वाकांक्षाएँ और अमेरिका की वैश्विक चौधराहट का एक जटिल मिश्रण था। इज़राइल जहाँ अपने पवित्र धर्मग्रंथ 'तालमुद' के प्राचीन संदर्भों के आधार पर एक वृहद यहूदी राष्ट्र के मानचित्र को मूर्त रूप देने का स्वप्न देख रहा था, वहीं अमेरिका के लिए ईरान वह अंतिम अभेद्य किला था जिसे ढहाए बिना उसकी 'ग्रेटर मिडिल ईस्ट' योजना अधूरी थी। अमेरिका के लिए ईरान को तोड़ना केवल एक शासन परिवर्तन का मुद्दा नहीं था, बल्कि रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों की घेराबंदी करने का एक अंतिम रणनीतिक पड़ाव था। इसके विपरीत, ईरान का संघर्ष अपनी अस्तित्वगत संप्रभुता की रक्षा का था। मध्य-पूर्व के विशाल भू-भाग में ईरान आज संभवतः एकमात्र ऐसा शक्तिशाली और संप्रभु राष्ट्र बनकर खड़ा है, जिसने अमेरिका के 'परोक्ष उपनिवेश' बनने की नियति को सिरे से खारिज कर दिया।
आज वैश्विक रणनीतिकारों के बीच एक बड़ा प्रश्न कौंध रहा है: दशकों से कड़े आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंधों की मार झेलने वाला ईरान, दुनिया की सबसे उन्नत सैन्य शक्तियों के साझा प्रहार के सामने महीने भर तक अनपेक्षित रूप से कैसे खड़ा रहा? इस प्रतिरोध की जड़ें अतीत के कड़वे अनुभवों में छिपी हैं। विशेषज्ञों का सूक्ष्म विश्लेषण बताता है कि ईरान ने इराक की तबाही और सद्दाम हुसैन के पतन से यह निर्णायक सबक सीख लिया था कि भविष्य के युद्ध केवल संख्या बल से नहीं, बल्कि 'असममित तकनीकी श्रेष्ठता' (Asymmetric Technological Superiority) से लड़े जाएंगे। उसी दौर से ईरान ने भूमिगत मिसाइल सिटीज, स्वदेशी ड्रोन तकनीक और साइबर युद्ध की ऐसी तैयारी शुरू कर दी थी, जिसने इस आधुनिक युद्ध में उसे पराजित होने से बचा लिया।
इस प्रतिरोध में रूस और चीन की भूमिका को भी हाशिए पर नहीं रखा जा सकता। यह सहयोग केवल किताबी मित्रता नहीं, बल्कि उन दोनों महाशक्तियों की 'रणनीतिक विवशता' भी थी। मास्को और बीजिंग भली-भांति जानते थे कि यदि ईरान का पतन होता है और वहाँ अमेरिकी प्रभाव वाला शासन स्थापित होता है, तो वाशिंगटन की सीधी पहुँच उनकी सीमाओं तक हो जाएगी। ईरान का गिरना यूरेशियाई सुरक्षा चक्र में एक ऐसा छेद कर देता जिसकी भरपाई असंभव होती
जब युद्ध अपने चरमोत्कर्ष पर था और अमेरिका को अहसास हुआ कि यह दलदल उसकी उम्मीद से कहीं अधिक गहरा है, तब वह एक ऐसे 'सम्मानजनक निकास' (Honorable Exit) की तलाश करने लगा जहाँ उसकी साख भी बची रहे और संघर्ष भी रुक जाए। ऐसे समय में पाकिस्तान की भूमिका एक 'मुफीद बिचौलिए' के रूप में उभरकर सामने आई। यह विडंबना ही है कि जिस दक्षिण एशिया में भारत 'बड़े भाई' और 'क्षेत्रीय शक्ति' होने का दावा करता है, वह इस पूरे कूटनीतिक खेल में नेपथ्य में खड़ा नजर आया।
भारतीय विदेश नीति की यह शिथिलता इस दौर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगी। जब विश्व इतिहास की धारा बदल रही थी, तब भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान अपने घरेलू चुनावी समीकरणों, आंतरिक विमर्शों और विपक्षी घेराबंदी में उलझा रहा। युद्ध के ठीक तीन दिन पहले की गई इज़राइल की यात्रा और ईरानी नेतृत्व (खुमैनी) के प्रति बरती गई कूटनीतिक औपचारिकता ने तेहरान के साथ भारत की सदियों पुरानी पारंपरिक मित्रता पर संदेह के बादल गहरे कर दिए। दक्षिण एशिया का नेतृत्व करने का अवसर भारत के हाथों से फिसलकर उन पड़ोसियों के पास चला गया जिन्होंने अपनी छोटी भौगोलिक सीमाओं के बावजूद बड़े और निडर निर्णय लिए।
पड़ोसी देशों ने इस वैश्विक संकट के दौरान जो साहसी उपस्थिति दर्ज कराई, वह भारत के लिए एक आईना है। श्रीलंका ने अमेरिकी दबाव की परवाह किए बिना भारत की धरती पर अभ्यास कर लौट रहे उन ईरानी सैनिकों की जान बचाई जो अमेरिकी हमले में घायल हुए थे। यह केवल मानवीय कार्य नहीं, बल्कि एक संप्रभु संदेश था। नेपाल ने शिक्षा के क्षेत्र में कॉर्पोरेट निजीकरण पर लगाम लगाकर अपनी अमेरिकी पूँजीवादी नकल खारिज कर दिया,तो वहीं बांग्लादेश ने अपने मंत्रिमंडल में हिंदुओं को शामिल कर एक समावेशी और स्थिर समाज का उदाहरण पेश किया, जो अक्सर भारत के लिए विमर्श का मुद्दा रहता है। इन सबसे अलग, पाकिस्तान ने अपनी गिरती हुई अंतरराष्ट्रीय साख को बचाने तथा आतंकी देश का दाग धोने के लिए कूटनीतिक चाल चलते हुए बिचौलिए की भूमिका हथिया ली और खुद को वैश्विक शांति की मेज पर प्रासंगिक बना लिया।
अंततः, मध्य-पूर्व की इस आग ने दक्षिण एशिया की राजनीति के व्याकरण को बदल दिया है। एक संदेश दुनिया में वायुमण्डल तैरने लगा है कि शायद दुनिया अब एक ध्रुवी से बहुत ध्रुवी होने की ओर अग्रसर हो चली है। यह संघर्ष केवल मिसाइलों और बमों का नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि आने वाले समय में केवल वही देश नेतृत्व करेंगे जो समय की नब्ज पहचानकर निडर फैसले ले सकें। जब इतिहास इस कालखंड का निष्पक्ष मूल्यांकन करेगा, तो वह केवल युद्ध के अंत की घोषणा नहीं करेगा, बल्कि उन शक्तियों की भी शिनाख्त करेगा जो अवसर होने के बावजूद अपनी रणनीतिक जड़ता के कारण इतिहास के हाशिए पर चले गए।
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