NEET, निराशा और एक छात्र की मौत: क्या यह केवल आत्महत्या है या संस्थानिक हत्या ?

Public Discourse
Published: May 18, 2026 | Author: प्रो.(डॉ) एच.एस.जी.राव

NEET, Despair, and a Student’s Death: Merely a Suicide or a Systemic Failure?

High-stakes competitive examinations in India, such as NEET and JEE, have evolved beyond academic assessments into grueling psychological battles, heavily tied to socio-economic mobility and family prestige. The tragic suicide of a student following the cancellation of the NEET exam underscores a deeper crisis within the nation's highly centralized and commercialized education framework. This editorial examines how systemic vulnerabilities—including recurrent paper leaks, structural instability, and an aggressive coaching culture—disproportionately burden middle- and lower-class families who invest their life savings into their children's futures. By replacing institutional diversity with a single, high-pressure gateway, the current model leaves students with zero alternatives, translating academic setbacks into absolute despair. The paper argues that reducing human sensitivity to mere numerical ranks demands an urgent policy shift toward mental health integration, institutional transparency, and robust social security for aspirants, challenging the ethical accountability of a system that breeds anxiety instead of hope.

देश में प्रतियोगी परीक्षाएँ अब केवल “परीक्षा” नहीं रह गई हैं; वे करोड़ों युवाओं के अस्तित्व, सम्मान और भविष्य का प्रश्न बन चुकी हैं। हाल ही में NEET परीक्षा रद्द होने के बाद एक छात्र द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। परिवार का कहना है कि छात्र भविष्य की अनिश्चितता से गहरे सदमे में था। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए राजनीतिक गलियारों से इसे “सिस्टम द्वारा हत्या” बताया गया। यह बयान राजनीतिक हो सकता है, लेकिन इसके भीतर छिपा सामाजिक सत्य कहीं अधिक भयावह है। प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी कैसी व्यवस्था बन चुकी है, जिसमें एक परीक्षा रद्द होने भर से कोई छात्र जीवन समाप्त करने को मजबूर हो जाता है?

भारत में NEET, JEE, UPSC जैसी परीक्षाएँ अब शिक्षा की प्रक्रिया कम और मानसिक युद्ध अधिक बन चुकी हैं। कोचिंग उद्योग, सामाजिक दबाव, बेरोजगारी, परिवार की अपेक्षाएँ और लगातार अस्थिर होती परीक्षा प्रणाली—ये सभी मिलकर युवाओं को ऐसे मानसिक तनाव में धकेल रहे हैं, जहाँ असफलता से अधिक भय अनिश्चितता का होता है। जब पेपर लीक होते हैं, परीक्षाएँ रद्द होती हैं या परिणामों पर संदेह उठते हैं, तब केवल “सिस्टम” की विश्वसनीयता नहीं टूटती; लाखों छात्रों का आत्मविश्वास भी टूट जाता है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार का छात्र वर्षों की मेहनत, आर्थिक संघर्ष और सामाजिक उम्मीदों के साथ परीक्षा देता है। परीक्षा रद्द होने का अर्थ उसके लिए केवल “फिर से एग्जाम” नहीं होता; वह समय, श्रम, पैसा और मानसिक संतुलन—सब कुछ पुनः दाँव पर लग जाने जैसा होता है।

NEET का आकर्षण केवल नौकरी तक सीमित नहीं है, यह एक सम्मानजनक और सुरक्षित पेशेवर जीवन का रास्ता माना जाता है। पहले अधिकांश मेडिकल कॉलेज सरकारी क्षेत्र में थे, लेकिन अब निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इन संस्थानों में MBBS की पढ़ाई पर पाँच वर्षों में लगभग 1 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है, जबकि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में यही डिग्री अपेक्षाकृत बहुत कम खर्च में पूरी हो जाती है। छात्रवृत्तियाँ भी गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों के लिए सहारा बनती हैं। यही कारण है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा होती है। यह प्रतिस्पर्धा केवल “मेरिट” की नहीं, बल्कि आर्थिक असमानता की भी लड़ाई बन जाती है। करोड़ों रुपये के निजी खर्च से बचने के लिए ही पेपर लीक और प्रश्नपत्र खरीद-बिक्री जैसे अपराधों का नेटवर्क पनपता है।

पहले Medical प्रवेश के कई विकल्प हुआ करते थे। विभिन्न राज्य अपनी अलग परीक्षाएँ कराते थे और केंद्रीय संस्थानों की भी अलग प्रवेश प्रक्रियाएँ थीं। लेकिन अब राष्ट्रीय स्तर पर एक ही परीक्षा ने छात्रों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति पैदा कर दी है। ऐसे में परीक्षा रद्द होने या असफल होने का अर्थ केवल एक अवसर खोना नहीं, बल्कि पूरे भविष्य के ढह जाने जैसा महसूस होता है। यही कारण है कि अनेक छात्र अवसाद और गहरे मानसिक संकट में चले जाते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत का शिक्षा मॉडल लगातार अधिक केंद्रीकृत और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होता गया है। स्कूल शिक्षा कमजोर हुई है और कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा को “रैंक उत्पादन” की फैक्ट्री में बदल दिया है। यहाँ छात्र को एक संवेदनशील मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि एक परिणाम के रूप में देखा जाता है। जब परिणाम टूटता है, तब उसके भीतर का व्यक्ति भी टूट जाता है।

दरअसल भारत में प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल रोजगार पाने का माध्यम नहीं रह गई हैं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक सम्मान और वर्गीय उन्नति का प्रतीक बन चुकी हैं। विशेषकर NEET और JEE जैसी परीक्षाएँ अब ऐसे “सामाजिक प्रमाणपत्र” में बदल गई हैं, जिनके माध्यम से परिवार अपनी हैसियत, सफलता और भविष्य को देखते हैं। एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे की तैयारी में केवल फीस ही नहीं लगाता, बल्कि अपनी जमा-पूँजी, जमीन, गहने, बचत और वर्षों के सपने तक दाँव पर लगा देता है। कई माता-पिता अपनी जरूरतें त्यागकर कोचिंग, हॉस्टल और किताबों पर खर्च करते हैं। ऐसे में परीक्षा केवल छात्र की व्यक्तिगत चुनौती नहीं रहती; वह पूरे परिवार की सामूहिक आकांक्षा बन जाती है।

यही कारण है कि परीक्षा रद्द होना, पेपर लीक होना या परिणामों पर संदेह उठना छात्रों और उनके परिवारों के भीतर गहरा मानसिक आघात पैदा करता है। छात्र को लगता है कि केवल उसका भविष्य नहीं टूटा, बल्कि माँ-बाप का त्याग, भरोसा और सामाजिक सम्मान भी संकट में पड़ गया है। भारतीय समाज में डॉक्टर या इंजीनियर बनना आज भी केवल पेशा नहीं, बल्कि “प्रतिष्ठा” का प्रश्न माना जाता है। गाँव-कस्बों में इसे परिवार की सामाजिक स्थिति बदलने का माध्यम समझा जाता है। इसीलिए असफलता का दबाव कई बार इतना असहनीय हो जाता है कि छात्र स्वयं को केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों का बोझ समझने लगता है। यहीं शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी दिखाई देती है—जहाँ शिक्षा ज्ञान, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना विकसित करने की प्रक्रिया कम, तथा सामाजिक प्रतिस्पर्धा का निर्मम युद्ध अधिक बन गई है।

यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या सरकारें केवल परीक्षा आयोजित कर देने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित मान सकती हैं? क्या मानसिक स्वास्थ्य सहायता, पारदर्शी परीक्षा तंत्र और छात्रों के लिए सामाजिक सुरक्षा अब शिक्षा नीति का अनिवार्य हिस्सा नहीं होना चाहिए? “सिस्टम द्वारा हत्या” जैसे शब्द कठोर लग सकते हैं, लेकिन यदि कोई व्यवस्था लगातार युवाओं को अवसाद, असुरक्षा और निराशा की ओर धकेल रही है, तो उस व्यवस्था की नैतिक जवाबदेही से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत आज “विश्वगुरु” बनने के सपने देख रहा है, लेकिन किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, डिजिटल परीक्षाओं या चमकदार नारों से नहीं होती; उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने युवाओं को आशा देता है या भय। यदि शिक्षा व्यवस्था छात्रों को जीवन नहीं, बल्कि मृत्यु की ओर धकेलने लगे, तो समस्या किसी एक छात्र की नहीं, पूरे राष्ट्र की है।

प्रो.एच.एस.जी.राव
About the Author

प्रो.एच.एस.जी.राव — वर्तमान में बी.आर.डी.पीजी कॉलेज, देवरिया, उत्तर प्रदेश में वनस्पति विज्ञान के विभागाध्यक्ष हैं। उन्होंने वनस्पति, पर्यावरण, जैवविविधता व शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके अनेक शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

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