क्या कार्बी आंगलांग अगला मणिपुर बनने दिया जा रहा है?

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Print ISSN: 2581-7884 | Volume III | Issue 33 | October-December 2025 |

Editorial

Date : 28 December 2025

Editor-in-Chief : Dr. R. Achal Pulastey


कार्बी आंगलांग कोई दूर-दराज़ का अनजान इलाका नहीं हैबल्कि भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित एक जनजातीय स्वायत्त क्षेत्र है। यह वही संविधान हैजिसे सत्ताएँ मंचों से नमन तो करती हैंलेकिन ज़मीन पर उसका खुला उल्लंघन होने देती हैं। कार्बी आंगलांग आज इसी संवैधानिक उपेक्षा की आग में सुलग रहा है।


                                           (चित्र गुगल से साभार)

पूर्वी असम का यह जिला खनिज-संपदा और कृषि-उत्पादन से समृद्ध है। यहाँ बड़े पैमाने पर अदरक की खेती होती हैजिसका निर्यात तक होता है। लगभग 12 लाख की आबादी वाले इस जिले में मूल कार्बी जनजाति अब अपने ही घर में सिमटती जा रही है। 1971 में जहाँ कार्बी आबादी 65 प्रतिशत थीवहीं 2011 तक यह घटकर 56 प्रतिशत रह गई। जनजातीय संगठनों का दावा इससे भी अधिक भयावह है—उनके अनुसार कार्बी अब केवल 35 प्रतिशत रह गए हैं। सवाल यह नहीं कि यह कैसे हुआसवाल यह है कि यह  होने दिया गया ।

छठी अनुसूची स्पष्ट कहती है कि गैर-आदिवासी यहाँ की ज़मीन पर स्थायी कब्जा नहीं कर सकते। फिर भी 1971 के बाद बिहारयूपी और नेपाल से आए भूमिहीन मजदूर पहले चाय बागानों में आएफिर धीरे-धीरे आदिवासी भूमि पर खेती और बसावट करने लगे। कुछ पैसों के बदले ज़मीन ली गईफिर कब्जा पक्का किया गया। राज्य सत्ता मूकदर्शक बनी रही। यही ‘धीमी घुसपैठ’ आज विस्फोटक संघर्ष में बदल चुकी है।

                                            (चित्र गुुगल से साभार)

हालिया हिंसा कोई अचानक भड़का उपद्रव नहींबल्कि वर्षों से जमा किए गए बारूद का विस्फोट है। छठ पर्व के दौरान जब ईंट-सीमेंट से स्थायी धार्मिक ढांचा बनाने की कोशिश हुईतब कार्बी समुदाय ने इसे केवल आस्था का नहींबल्कि स्थायी कब्जे का संकेत माना। उनकी आशंका गलत नहीं थी। परिणामस्वरूप 22–23 दिसंबर को हुई हिंसा में दो लोगों की मौत हुई150 से अधिक लोग घायल हुए और 60 पुलिसकर्मी भी चपेट में आए। सबसे अमानवीय दृश्य था—एक दिव्यांग युवक सूरज डे को भीड़ द्वारा जिंदा जला दिया जाना। यह कोई “कानून-व्यवस्था की समस्या” नहींयह राज्य की नैतिक विफलता है।

कार्बी समाज के लोग आज यह सवाल कर रहे हैं—हमने ज़मीन दीव्यापार की जगह दीपड़ोस साझा कियाफिर हमें ही भगाने और मारने की हिम्मत कहाँ से आईपश्चिम कार्बी आंगलांग में 7,000 बीघा से अधिक VGR और PGR जैसी आरक्षित चारागाह भूमि पर बाहरी कब्जा हो चुका है। खेरोनी जैसे बाजार अब लगभग पूरी तरह हिंदी भाषी समुदायों के नियंत्रण में हैं। यह केवल आर्थिक वर्चस्व नहींयह जनजातीय अस्तित्व का क्षरण है।

कार्बी युवा 15 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठे रहे। उनकी माँग कोई असंवैधानिक नहीं थी—वे केवल यही चाहते थे कि संविधान के तहत आरक्षित उनकी ज़मीन उन्हें लौटाई जाए। लेकिन सरकार ने संवाद नहींपुलिस भेजी। प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाया गयाऔर फिर वही हुआ जो हर बार होता है—हिंसा भड़कीनिर्दोष मारे गएऔर राज्य हाथ मलता रह गया।

सबसे खतरनाक चुप्पी दिल्ली की है। केंद्र सरकार मियाँ बनाम हिंदूबांग्लादेशी बनाम रोहिंग्या जैसे सुविधाजनक विमर्शों में उलझी हुई हैजबकि देश के भीतर संवैधानिक जनजातीय क्षेत्रों में आग लगी है। शेष भारत मंदिर–मस्जिद में व्यस्त है और पूर्वोत्तर एक बार फिर ‘दूर का मामला’ बना दिया गया है।

मणिपुर में भी यही हुआ था—लंबे समय तक अनदेखीफिर अचानक विस्फोट। कार्बी आंगलांग आज उसी मोड़ पर खड़ा है। यदि अब भी राज्य और केंद्र ने हस्तक्षेप नहीं कियायदि छठी अनुसूची को काग़ज़ से निकालकर ज़मीन पर लागू नहीं किया गयातो आने वाले समय में कार्बी आंगलांग का नाम भी उन इलाकों में जोड़ा जाएगाजहाँ भारत अपने ही नागरिकों को सुरक्षा देने में असफल रहा।

यह केवल कार्बी समाज की लड़ाई नहीं है। यह संविधानसंघीय ढाँचे और जनजातीय अस्तित्व की लड़ाई है। सवाल यह नहीं कि कार्बी आंगलांग मणिपुर बनेगा या नहीं—सवाल यह है कि क्या सत्ता उसे बनने से रोकना भी चाहती है ?यदि नहीं रोका जा सका तो प्राकृति सौन्दर्य व सम्पदा से समृद्ध जिला नर्क बन जायेगा।

*(लेखक पूर्वोत्तर भारत के अध्येता  हैं। उनकी पुस्तकें “कुरुना से कामाख्या” और “रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़” अमेज़न पर उपलब्ध हैं।)

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