अरावली, हसदेव, लद्दाख और निकोबार : विकास बनाम विनाश

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Print ISSN: 2581-7884 | Volume III | Issue 33 | October-December 2025 |

Editorial

Date : 25 December 2025

Editor-in-Chief : Dr. R. Achal Pulastey


भारत के विविध भौगोलिक क्षेत्र उसकी पर्यावरणीय स्थिरता की आधारशिला हैं। अरावली की प्राचीन पर्वतमालाहसदेव के सघन वनलद्दाख का हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र तथा निकोबार द्वीपों के वर्षावन न केवल जैव विविधता के केंद्र हैंबल्कि जलवायु संतुलनजल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में पहाड़ों और वनों की तीव्र कटाई ने विकास और पर्यावरण के बीच के संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।-डॉ.अचल पुलस्तेय


भारत के विविध भौगोलिक क्षेत्र उसकी पर्यावरणीय स्थिरता की आधारशिला हैं। अरावली की प्राचीन पर्वतमालाहसदेव के सघन वनलद्दाख का हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र तथा निकोबार द्वीपों के वर्षावन न केवल जैव विविधता के केंद्र हैंबल्कि जलवायु संतुलनजल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में पहाड़ों और वनों की तीव्र कटाई ने विकास और पर्यावरण के बीच के संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

अरावली पर्वतमालाजिसे उत्तर-पश्चिम भारत का “हरित कवच” कहा जाता हैआज खनन और अनियंत्रित शहरी विस्तार के दबाव में है। इस क्षेत्र में पहाड़ों की कटाई ने भूजल पुनर्भरण की प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित किया हैजिससे मरुस्थलीकरण और वायु प्रदूषण की समस्या तीव्र हुई है। यह स्थिति दर्शाती है कि प्राकृतिक अवरोधों को नज़रअंदाज़ कर किया गया विकास दीर्घकालिक रूप से आत्मघाती सिद्ध हो सकता है।

इसी प्रकारछत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य औद्योगिक विस्तार की नीति का एक महत्वपूर्ण परीक्षण क्षेत्र बन गया है। कोयला खनन के लिए वनों की कटाई ने न केवल जैव विविधता को नुकसान पहुँचाया हैबल्कि आदिवासी समुदायों के पारंपरिक जीवन-तंत्र को भी अस्थिर किया है। यह प्रश्न प्रासंगिक हो उठता है कि क्या ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर पारिस्थितिक और सामाजिक न्याय की अनदेखी स्वीकार्य है।

लद्दाख का उदाहरण और भी अधिक संवेदनशील है। हिमालयी क्षेत्र में पहाड़ों की कटाईसड़क और बुनियादी ढांचे का तेज़ी से विकास जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और गहरा कर रहा है। भूस्खलनग्लेशियरों का तीव्र पिघलाव और जल संकट इस बात के संकेत हैं कि यह क्षेत्र विकास की वर्तमान दिशा को लंबे समय तक सहन नहीं कर सकता।

निकोबार द्वीप समूह में वनों की कटाई का प्रभाव केवल स्थलीय पर्यावरण तक सीमित नहीं है। यह समुद्री पारिस्थितिकीतटीय स्थिरता और आदिवासी संस्कृतियों पर भी गहरा असर डाल रहा है। जैव विविधता से भरपूर इस क्षेत्र में बड़े पैमाने की परियोजनाएं प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को बढ़ा सकती हैंजिनके परिणाम अपरिवर्तनीय हो सकते हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक हो जाता है कि विकास को केवल आर्थिक सूचकांकों के आधार पर न आँका जाए। टिकाऊ विकास की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब पर्यावरणीय वहन क्षमतास्थानीय समुदायों की भागीदारी और दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभावों को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा जाए। शोध और नीति के बीच संवाद को मज़बूत करना आज की प्राथमिक आवश्यकता है।

निष्कर्ष यह है कि अरावलीहसदेवलद्दाख और निकोबार में हो रही पहाड़-पेड़ कटाई भारत के पर्यावरणीय भविष्य के लिए चेतावनी है। यदि विकास की दिशा में पर्यावरणीय विवेक को शामिल नहीं किया गयातो यह प्रगति नहींबल्कि विनाश का मार्ग सिद्ध होगा।  

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