AI, इंसान की सोच का विकल्प नहीं विस्तार में सहयोगी है ।


AI और क्रिएटिविटी: जब सवाल ‘क्या सोचना है’ नहीं, ‘कैसे सोचना है’ बन जाए

आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह इंसानी रचनात्मकता को बढ़ाएगा या धीरे-धीरे उसे कुंद कर देगा?

व्यवहार में हम देखते हैं कि कई बार AI से काम लेना हमारे सोचने की मेहनत कम कर देता है। लेकिन समस्या AI में नहीं, बल्कि उससे पूछे जाने वाले सवालों में है। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि हम AI से उत्तर मांग रहे हैं या सोचने की प्रक्रिया

क्रिएटिविटी कैसे जन्म लेती है?

तीन दशकों से इंसानी क्रिएटिविटी पर हुए शोध बताते हैं कि लोग तब सबसे बेहतर काम करते हैं जब उन्हें:

नए दृष्टिकोण मिलते हैं

सोचने के अलग-अलग रास्ते दिखते हैं

तय उत्तर नहीं, बल्कि खुली संभावनाएँ मिलती हैं

ब्रायन उज़ी जैसे शोधकर्ता मानते हैं कि रचनात्मकता एक सहयोगात्मक प्रक्रिया है। यह अकेले दिमाग की उपज नहीं, बल्कि संवाद, टकराव और विविधता से पैदा होती है।

यहीं से AI की सही भूमिका शुरू होती है।

जब AI रचनात्मकता को घटा देता है

आज AI का सबसे आम उपयोग कुछ इस तरह होता है:

इस विषय पर नए आइडिया दो”

कोई इनोवेटिव कॉन्सेप्ट बताओ”

रिसर्च के लिए हाइपोथिसिस बना दो”

ऐसे सवालों में AI को निर्णायक बना दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि उपयोगकर्ता उसके जवाबों को अंतिम सत्य मानने लगता है। यही स्थिति थॉट एंकरिंग कहलाती है—जहाँ सोच एक शुरुआती बिंदु से आगे बढ़ ही नहीं पाती।

धीरे-धीरे रचनात्मकता की जगह कॉपी-पेस्ट बुद्धि ले लेती है।

क्या AI सच में हमसे ज़्यादा क्रिएटिव है?

हालिया शोध (डाइवर्जेंट एसोसिएशन टास्क – DAT) से एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है।
औसतन, AI और इंसान की क्रिएटिव परफॉर्मेंस लगभग बराबर पाई गई।

यानी AI स्वाभाविक रूप से इंसान से ज़्यादा रचनात्मक नहीं है।
फिर भी हम उसे अधिक सक्षम मान लेते हैं—क्योंकि वह तेज़ है, आत्मविश्वास से बोलता है और बड़े डेटा पर आधारित है।

लेकिन रचनात्मकता केवल पैटर्न बनाने का नाम नहीं है।
यह अनुभव, जोखिम, असफलता और भटकाव से निकलती है—जो AI के पास नहीं होते।

जब AI ‘उत्तर’ नहीं, ‘प्रक्रिया’ देता है

दिलचस्प बदलाव तब आता है जब AI से यह पूछा जाता है:

मैं अपनी सोच को बेहतर कैसे बना सकता हूँ?”

DAT प्रयोगों में, जब प्रतिभागियों ने AI से सीधे शब्द नहीं मांगे, बल्कि रणनीति पूछी, तो उनके स्कोर अचानक बहुत बढ़ गए।

AI ने एक सरल तरीका सुझाया:

पहले अलग-अलग कैटेगरी सोचें (जैसे—प्रकृति, तकनीक, भावनाएँ, वस्तुएँ)।

फिर हर कैटेगरी से एक शब्द चुनें।

यह तरीका सोच को एक ही दिशा में फँसने से रोकता है।
यहीं AI क्रिएटर नहीं, बल्कि क्रिएटिव पार्टनर बन जाता है।

AI से क्या पूछें, ताकि क्रिएटिविटी बढ़े?

अगर आप लेखक, शोधकर्ता, शिक्षक, डिज़ाइनर या विचारक हैं, तो AI से ऐसे सवाल ज़्यादा उपयोगी होंगे:

इस विषय को देखने के कितने अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं?

सोच को थॉट एंकरिंग से बचाने के तरीके क्या हैं?

किन डोमेन्स को आपस में जोड़ा जा सकता है?

आइडिया जनरेशन की कोई प्रक्रिया सुझाइए, न कि आइडिया

इन सवालों में AI आपकी जगह नहीं सोचता—
वह आपको बेहतर सोचने का औज़ार देता है।

इंसानी रचनात्मकता: अव्यवस्था में छिपा पैटर्न

इंसानी क्रिएटिविटी अक्सर गड़बड़ लगती है—
गलत रास्ते, असफल प्रयोग, अनपेक्षित मोड़।

लेकिन शोध बताते हैं कि इसके भीतर कुछ स्थायी सिद्धांत काम करते हैं:

विचारों की विविधता

खुली खोज (exploration)

सुरक्षित असहमति

प्रक्रिया-आधारित मार्गदर्शन

AI इन सिद्धांतों को मज़बूत कर सकता है—अगर उसे सही जगह रखा जाए।

 प्रतिस्पर्धा नहीं, साझेदारी

AI न तो इंसानी क्रिएटिविटी का अंत है,
न ही उसका विकल्प।

वह एक मेटा-टूल है—
जो यह तय कर सकता है कि हम सोच को संकुचित करेंगे या विस्तृत।

भविष्य की सबसे बड़ी रचनात्मक उपलब्धियाँ उन लोगों से आएँगी,
जो AI से यह नहीं पूछेंगे—

मुझे क्या सोचना चाहिए?”

बल्कि यह पूछेंगे—

मैं और बेहतर कैसे सोच सकता हूँ?”

यहीं से AI, इंसान की सोच का विस्तार बनता है—उसका विकल्प नहीं

 

 

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