Culture
Date : 14 January 2026
Author : Achal Pulastey
Culture reflects the collective memory, traditions and creative expressions of society. It includes literature, art, folklore, knowledge systems and everyday practices that shape human identity and social values.
संस्कृति समाज की सामूहिक स्मृति, परम्पराओं और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रतिबिम्ब होती है। इसमें साहित्य, कला, लोकपरम्पराएँ, ज्ञान प्रणालियाँ तथा दैनिक जीवन की वे सभी प्रथाएँ शामिल होती हैं, जो मानव की पहचान और सामाजिक मूल्यों को आकार देती हैं।
हर वर्ष 14 जनवरी को मनाई जाने वाली मकर संक्रांति को सामान्यतः एक धार्मिक पर्व के रूप में देखा जाता है। तिल-गुड़, पतंग, पोंगल और खिचड़ी जैसे लोकाचार इसके साथ जुड़ जाते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपा खगोलीय अर्थ अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है। वास्तव में मकर संक्रांति सूर्य, पृथ्वी और तारामंडल के आपसी संबंधों से जुड़ी एक सुनिश्चित खगोलीय घटना है, जिसका सीधा संबंध मौसम, कृषि और मानव जीवन से है।इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होता है। खगोलीय रूप में यह दिन निश्चित है,लेकिन धार्मिक कर्मकाण्डो को लेख पूर्वी उत्तर प्रदेश में कभी-कभी सुबह के स्नान करने के लिए 15 जनवरी को मनाने की बात कर दी जाती है। इससे दुविधा उत्पन्न हो जाती है। जबकि वास्तविकता यह है सूर्य का मकर संक्राति का दिन निश्चित है। इसलिए पूरे देश नहीं दक्षिण एशिया में यह पर्व 14 जनवरी को ही निश्चित रूप में मना लिया जाता है।
दर असल इस पर्व के पीछे का विज्ञान यह है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365.58 अंश में पूरी करती है, जिसे सौरवर्ष कहा जाता है। इस यात्रा के दौरान पृथ्वी (आकाश में सूर्य का आभासी पथ) बारह स्थिर तारासमूहों से होकर गुजरती है। ये तारासमूह पृथ्वी से देखने पर विभिन्न जीव-जंतुओं अथवा प्रतीकात्मक आकृतियों जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए इन्हें मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन नाम दिए गए। इन्हीं के आधार पर सौर महीनों की रचना हुई है।
जब सूर्य एक तारासमूह से दूसरे तारासमूह में प्रवेश करता है, तो उस क्षण को संक्रांति कहा जाता है। मकर संक्रांति तब आती है, जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। यही वह समय है जब सूर्य की दिशा दक्षिण गोलार्द्ध से उत्तर गोलार्द्ध की ओर मानी जाती है, जिसे परंपरागत रूप से उत्तरायण कहा गया है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव यह होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध में दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है।
भारतीय खगोल परंपरा में ग्रहों की स्थिति को समझने के लिए स्थिर तारों को मील-पत्थर की तरह प्रयोग किया गया। इन्हीं स्थिर तारों के समूह को नक्षत्र कहा गया। अश्विनी से रेवती तक 27 नक्षत्रों की व्यवस्था बनाई गई और बाद में अभिजित नक्षत्र जोड़कर कालगणना को और अधिक सटीक किया गया। मकर संक्रांति का समय नक्षत्रीय गणना के अनुसार सूर्य की एक निश्चित स्थिति को दर्शाता है, जिससे इसकी वैज्ञानिकता स्पष्ट होती है।
इसी खगोलीय परिवर्तन के कारण मकर संक्रांति केवल भारत तक सीमित नहीं है। पूरे दक्षिण एशिया में यह पर्व अलग-अलग नामों और रूपों में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू, गुजरात-राजस्थान में उत्तरायण, कर्नाटक और आंध्र-तेलंगाना में संक्रांति तथा केरल में मकरविलक्कु के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है। नेपाल में इसे माघे संक्रांति, बांग्लादेश में पौष संक्रांति और श्रीलंका में थाई पोंगल कहा जाता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि बांग्लादेश में यह पर्व धार्मिक सीमाओं से परे एक लोक-सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिसमें मुस्लिम समुदाय की भी भागीदारी होती है।
मकर संक्रांति का सीधा संबंध कृषि और पर्यावरण से है। यही वह समय है जब रबी फसलों की वृद्धि का चरण तेज होता है और आने वाले मौसम का संकेत मिलता है। भारतीय परंपरा में सूर्य के साथ-साथ चंद्रमा की गति को भी महत्त्व दिया गया, जिससे चंद्रवर्ष की अवधारणा विकसित हुई। सौर और चंद्र—दोनों कालगणनाओं का यह संतुलन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता हमारे सामने गंभीर चुनौती के रूप में खड़ी है, तब मकर संक्रांति जैसे पर्व हमें प्रकृति की लय को समझने और उसके साथ सामंजस्य बनाने की सीख देते हैं। यह पर्व याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने आकाश की गतिविधियों को केवल देखा ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवन, कृषि और समाज के साथ गहराई से जोड़ा। मकर संक्रांति वास्तव में सूर्य की चाल के साथ-साथ मनुष्य की चेतना को भी नई दिशा देने वाला पर्व है।
2026 में मकर संक्रांति तिथि की दुविधा
विक्रम पंचांग के अनुसार, माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि यानी 14 जनवरी को मकर संक्रांति सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे अर्थात पृथ्वी दिन के 03 बजकर 13 मिनट पर मकर राशि के सामने होगी। इसलिए ताप ,दिन के वृद्धि क्रम का यह पर्व 14 जनवरी को ही पूरे देश में मनाया जायेगा।
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