डॉ. चतुरानन ओझा1
1सामाजिक कार्यकर्ता, सह
संयोजक-समाज शिक्षा आंदोलन उत्तर प्रदेश
समकालीन वैश्विक व्यवस्था में ‘विकास’ को राष्ट्रों की प्रगति का प्रमुख मापदंड माना जाने लगा है। आर्थिक वृद्धि, अवसंरचनात्मक विस्तार, शहरी सौंदर्यीकरण और तकनीकी आधुनिकीकरण को विकास के केंद्रीय संकेतकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु यह शोध-पत्र तर्क देता है कि विकास और प्रगति को समानार्थी मान लेना न केवल वैचारिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी घातक सिद्ध हो रहा है। विशेष रूप से भारत जैसे प्राचीन सभ्यतागत समाज में, जहाँ नगर केवल भौतिक संरचनाएँ नहीं बल्कि जीवित सांस्कृतिक इकाइयाँ हैं, वहाँ आयातित विकास मॉडल गंभीर संकट उत्पन्न कर रहे हैं।
यह अध्ययन विकास की सैद्धांतिक अवधारणाओं की समीक्षा करते हुए, उत्तर-औपनिवेशिक और स्वदेशी दृष्टिकोणों को सामने लाता है। काशी के मणिकार्णिका घाट को एक विस्तृत केस-स्टडी के रूप में लेकर यह शोध दर्शाता है कि किस प्रकार आधुनिक विकास परियोजनाएँ सांस्कृतिक धरोहर, पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय आजीविका को हाशिए पर धकेल रही हैं। शोध का निष्कर्ष यह प्रतिपादित करता है कि विकास और संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि सहभागी, संवेदनशील और स्वदेशी विकास मॉडल के माध्यम से दोनों का समन्वय संभव है।
मुख्य शब्द – विकास, प्रगति, आयातित विकास माडल, सांस्कृतिक धरोहर, स्वदेशी विकास, काशी, मणिकर्णिका घाट, आजीविका, संरक्षण
1. भूमिका (Introduction)
इक्कीसवीं
सदी को प्रायः ‘विकास का युग’ कहा जाता है। राष्ट्रों की पहचान अब उनकी सैन्य
शक्ति या सांस्कृतिक प्रभाव से अधिक उनके आर्थिक आँकड़ों और अवसंरचनात्मक
परियोजनाओं से होने लगी है। सकल घरेलू उत्पाद (GDP), स्मार्ट सिटी, मेगा
कॉरिडोर, हाईवे, मेट्रो रेल और वैश्विक
निवेश—इन सबको विकास का पर्याय मान लिया गया है। इस प्रक्रिया में ‘विकास’ और
‘प्रगति’ के बीच का सूक्ष्म किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर लगभग लुप्त हो गया है।
विकास
मूलतः साधन (means)
है, जबकि प्रगति लक्ष्य (end) होनी चाहिए। किंतु समकालीन विमर्श में साधन ही लक्ष्य बन गया है। जब विकास
को केवल भौतिक विस्तार और आर्थिक वृद्धि तक सीमित कर दिया जाता है, तब उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक आयाम उपेक्षित
हो जाते हैं। यह समस्या विशेष रूप से भारत जैसे समाज में गंभीर हो जाती है,
जहाँ सभ्यता की निरंतरता हजारों वर्षों में विकसित हुई है।
यह
शोध-पत्र इसी वैचारिक संकट को केंद्र में रखकर यह प्रश्न उठाता है कि वर्तमान
विकास मॉडल किस प्रकार भारतीय सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक धरोहर और स्थानीय जनजीवन के साथ
टकराव की स्थिति पैदा कर रहा है।
2. विकास की अवधारणा : ऐतिहासिक और सैद्धांतिक
परिप्रेक्ष्य
विकास
की आधुनिक अवधारणा का उद्भव यूरोपीय औद्योगिक क्रांति से जुड़ा है। अठारहवीं और
उन्नीसवीं शताब्दी में विकास को उत्पादन, तकनीक और पूँजी संचय से जोड़ा गया। द्वितीय
विश्व युद्ध के बाद यह अवधारणा वैश्विक स्तर पर ‘डेवलपमेंट थ्योरी’ के रूप में
स्थापित हुई।
रोस्टो
(1960) ने विकास को पाँच चरणों में बाँटते हुए यह मान्यता स्थापित की कि सभी समाज
एक ही विकास पथ से गुजरते हैं। यह दृष्टिकोण मूलतः रैखिक (Linear) और सार्वभौमिक (Universal) था, जिसने स्थानीय विविधताओं को नकार दिया।
इसके
विपरीत, अमर्त्य सेन (1999) ने विकास को ‘स्वतंत्रता के
विस्तार’ के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार विकास का उद्देश्य केवल आय बढ़ाना
नहीं, बल्कि लोगों की वास्तविक क्षमताओं (Capabilities)
का विस्तार करना है—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,
गरिमा और सामाजिक भागीदारी।
महात्मा गांधी का विकास-दर्शन आधुनिक विकास विमर्श से मौलिक रूप से भिन्न है। गांधी के लिए विकास का केंद्र नैतिकता, आत्मनिर्भरता और ग्राम-आधारित अर्थव्यवस्था थी। उनका ‘हिंद स्वराज’ आधुनिक औद्योगिक सभ्यता की तीव्र आलोचना प्रस्तुत करता है।
3. उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भ में विकास की आलोचना
उत्तर-औपनिवेशिक
चिंतकों ने विकास को सत्ता और प्रभुत्व के उपकरण के रूप में देखा है। आंद्रे गुंडर
फ्रैंक और समीर अमीन जैसे विद्वानों ने यह तर्क दिया कि विकास और अविकास एक ही
वैश्विक प्रणाली के दो पहलू हैं।
वंदना
शिवा के अनुसार आधुनिक विकास मॉडल प्रकृति और स्थानीय समुदायों के ज्ञान को नकारता
है। यह मॉडल संसाधनों को बाज़ार की वस्तु में बदल देता है, जिससे
पर्यावरणीय असंतुलन और सामाजिक विषमता बढ़ती है।
भारतीय संदर्भ में यह आलोचना और भी प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि यहाँ विकास अक्सर औपनिवेशिक शहरी ढाँचों और पश्चिमी आधुनिकता की नकल के रूप में सामने आता है।
4. आयातित विकास मॉडल और भारतीय शहर
स्वतंत्रता
के बाद भारत ने औद्योगीकरण और शहरीकरण को विकास का मुख्य मार्ग चुना। उदारीकरण (1991) के बाद यह
प्रक्रिया और तेज़ हो गई। विदेशी निवेश और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दबाव में
भारतीय शहरों को ‘वैश्विक शहर’ बनाने की होड़ शुरू हो गई।
इस
प्रक्रिया में शहरों की ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना को बाधा के रूप में देखा जाने
लगा। पारंपरिक बाज़ार,
संकरी गलियाँ, धार्मिक स्थल और स्थानीय
समुदाय—इन सबको ‘पिछड़ेपन’ का प्रतीक मानकर हटाया जाने लगा।
भारतीय
शहरों की जैविक संरचना—जहाँ आवास, कार्य, आस्था और सामाजिक
जीवन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं—आयातित विकास मॉडल में टूट जाती है।
5. शहरी सौंदर्यीकरण : विचारधारा और सत्ता
शहरी
सौंदर्यीकरण केवल स्थापत्य या डिज़ाइन का प्रश्न नहीं है, बल्कि वह
सत्ता और वर्ग का प्रश्न भी है। यह तय किया जाता है कि शहर किसके लिए सुंदर बनाया
जाए—स्थानीय निवासियों के लिए या पर्यटकों और निवेशकों के लिए।
लेफेब्व्रे
(1991) के ‘Right to the City’ सिद्धांत के अनुसार शहर पर
पहला अधिकार वहाँ रहने वालों का होना चाहिए। किंतु आधुनिक विकास परियोजनाओं में यह
अधिकार कॉर्पोरेट हितों के हाथों चला जाता है।
6. काशी : सभ्यता, स्मृति
और निरंतरता
काशी
केवल एक नगर नहीं,
बल्कि भारतीय सभ्यता की स्मृति है। यह नगर समय के रैखिक प्रवाह को
चुनौती देता है—यहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ
विद्यमान हैं।
काशी
की संरचना किसी आधुनिक मास्टर प्लान से नहीं, बल्कि सदियों के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास से
बनी है। इसके घाट, गलियाँ, मंदिर और
मोहल्ले एक जीवंत सांस्कृतिक पारिस्थितिकी (Cultural Ecology) का निर्माण करते हैं।
7. मणिकार्णिका घाट : एक गहन केस-स्टडी
मणिकार्णिका
घाट काशी का हृदय है। यह केवल दाह-संस्कार स्थल नहीं, बल्कि भारतीय
मृत्यु-दर्शन और मोक्ष की अवधारणा का मूर्त रूप है। यहाँ मृत्यु को भय नहीं,
बल्कि जीवन की स्वाभाविक परिणति के रूप में देखा जाता है।
इस
घाट से जुड़े समुदाय—डोम,
पुरोहित, नाविक, दुकानदार—सदियों
से एक विशिष्ट सामाजिक तंत्र का निर्माण करते आए हैं। यह तंत्र न तो पूरी तरह
धार्मिक है, न पूरी तरह आर्थिक; यह
दोनों का संतुलन है।
आधुनिक
विकास परियोजनाओं में जब इस क्षेत्र को केवल ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर ज़ोन’ के रूप में
देखा गया, तब इस सांस्कृतिक तंत्र को गंभीर क्षति पहुँची।
8. विकास और स्थानीय आजीविका : संरचनात्मक
विस्थापन
विकास
परियोजनाओं का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव स्थानीय आजीविका पर पड़ता है। छोटे दुकानदार, श्रमिक और
पारंपरिक पेशे विकास की भाषा में ‘अनौपचारिक’ और ‘अव्यवस्थित’ कहकर हटा दिए जाते
हैं।
यह
विस्थापन केवल भौतिक नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक भी होता है। जब किसी समुदाय को उसके पारंपरिक
स्थान से हटाया जाता है, तो उसकी पहचान और सामाजिक पूँजी भी
नष्ट हो जाती है।
9. पर्यावरण, नदी और विकास
गंगा
केवल एक नदी नहीं,
बल्कि भारतीय सभ्यता की जीवनरेखा है। काशी का विकास यदि गंगा के
प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाता है, तो
उसका प्रभाव केवल स्थानीय नहीं, बल्कि सभ्यतागत होता है।
आधुनिक
विकास मॉडल नदी को सौंदर्यीकरण की वस्तु बना देता है, जबकि भारतीय
दृष्टि में नदी एक जीवित इकाई है।
10. विकास बनाम संरक्षण : एक झूठा द्वंद्व
आवश्यकता है दृष्टिकोण की—जहाँ विकास का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि संवर्धन हो।
11. सहभागी और स्वदेशी विकास मॉडल
इस
शोध का केंद्रीय प्रस्ताव यह है कि भारत के लिए स्वदेशी विकास मॉडल अनिवार्य है।
इसका अर्थ आधुनिकता का निषेध नहीं, बल्कि उसका स्थानीयकरण है।
सहभागी
विकास में स्थानीय समाज केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि निर्णय-कर्ता होता है। यही लोकतांत्रिक
विकास की आत्मा है।
12. निष्कर्ष (Conclusion)
यह
शोध-पत्र निष्कर्ष निकालता है कि वर्तमान आयातित विकास मॉडल भारतीय समाज के लिए
दीर्घकालिक रूप से विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। यदि विकास के नाम पर सांस्कृतिक
धरोहर, पर्यावरण और स्थानीय आजीविका नष्ट होती है, तो वह
प्रगति नहीं कही जा सकती।
काशी
का मणिकार्णिका घाट इस समस्या का प्रतीकात्मक उदाहरण है। आवश्यकता है ऐसे विकास की
जो स्मृति, पहचान और न्याय को केंद्र में रखे। विकास तभी सार्थक होगा जब वह समाज,
संस्कृति और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े।
संदर्भ
2-Gandhi, M. K. (1960). Hind Swaraj. Navajivan.
3-Shiva, V. (2005). Earth Democracy. Zed Books.
4-Lefebvre, H. (1991). The Production of Space. Blackwell.
5-UNESCO (2011). Historic Urban Landscape Recommendation.
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