-उद्भव मिश्र
“कुरुना से कामाख्या” कहने को तो यात्रा वृतांत है परन्तु पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि लेखक डॉ. अचल पुलस्तेय ने पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तर बिहार-बंगाल और असम के इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, पुराण, मिथक, आर्य विदेह-आदिम संघर्ष, पर्यावरण को एक सूत्र में पिरो कर शोधग्रंथ लिख दिया है। लेखक डॉ.अचल पुलस्तेय मूलतः एक चिकित्सक हैं, साथ कवि-कथाकार और लोक संस्कृति अध्येता भी हैं। इसी लिए उनकी गहरी यात्रा दृष्टि से रास्ते में पड़ने वाले जनजीवन का इतिहास, समाज, संस्कृति, राजनीति, आस्था से लेकर नदी, पहाड़, वन पर्यावरण कुछ भी बच नहीं सका है। जिनसे संवाद करते हुए यात्री लेखक यात्रा वृतांत को इस लय से प्रस्तुत करता है कि पाठक भी लेखक का सहयात्री बनने में विवश हो जाता है। जिसका एक कारण यह भी है कि पुलस्तेय का गँवई मन पूरी यात्रा में अपनी सभ्यता, संस्कृति, बोली-भाषा में राष्ट्रीयता को टटोलते रहता है।
वृतांत की
शुरुआत बिहार के मुजफ्फरपुर हाइवे बाई पास की एक दुकान से होती है, लेकिन चाय-समोसे
खाकर गुवाहाटी का रास्ते पूछने के बाद लेखक यात्रा की शुरुआती जगह अपने गाँव
पैकौली महाराज (देवरिया -उप्र) लौटता है। फिर शुरु होती है कुरुना नाले की कहानी, जिसमें
साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट करता है कि वर्तमान का कुरुना नाला बौद्धकालीन मृत
नदी है,जो कालगति से नाला में तब्दील हो चुकी है। फिर इस मृत नदी तट के वासिंदों, जिले
के इतिहास, बसावट-बुनावट, विकास खेती-बारी, समाज-संस्कृति की बात करते हुए लेखक
कुरुना के उद्गम इलाके गौतम बुद्ध के परिनिर्वाण स्थल कुशीनगर पहुँचता है। जहाँ
दूसरी बौद्ध कालीन मृत नदी हिरण्यावती से संवाद करते हुए इलाकाई इतिहास और मिथकों
से रूबरू करा देता है।
बेजोड़
काव्यात्मक शैली में सहयात्री से बात करते हुए डॉ पुलस्तेय एन.एच-27 से बिहार में
प्रवेश करते हैं। फिर गंडक, बागमती, कमला भुतही बलान,बिहुला,तियुगा,कोशी,मेची
नदियों की आत्मकथा के बहाने मार्ग में पड़ने वाले उत्तर बिहार के नगरों गोपालगंज, मुजफ्फरपुर,
दरभंगा, फार्बिस- गंज,अररिया,किसनगंज आदि के इतिहास,भूगोल,मिथक,पुराण, समाज,खेत-खलिहान,
बाजार, पर्यावरण, राजनीति ,जातीय संघर्ष की पर्ते खोल कर, विडम्बनाओं, समस्याओं की चिंता
में पाठक को भी शामिल कर लेते हैं पुलस्तेय ।
यात्रा के
दौरान पुलस्तेय अपनी माटी और लोक संस्कृति को नहीं छोड़ पाते हैं,जो भी देखते है उसका
तार भोजपुरिया लोक संस्कृति से जोड़ने की कोशिश करते हैं। बिहुला नदी को देखते ही
उन्हें विदेशिया नाच में सती बिहुला की कथा याद आ जाती है, जिसे बड़े मार्मिक ढंग
से प्रस्तुत किया है। रास्ते में चाय-पानी के लिए रुकने में दुकानदारों,स्थानीय
लोगों से बात-चीत में कोस-कोस पर बदलती बोलियों के फर्क पर भी पुलस्तेय की गहरी
नजर रहती है,इसलिए लिखते हैं कि “भोजपुरी को बंगाली
शैली में बोलने पर मैथिली हो जाती है।”
लोकधर्मी
व्यक्तित्व के धनी डॉ. पुलस्तेय जब मैथिली संस्कृति के प्रतीक विद्यापति और शारदा
सिन्हा के माधुर्य में ड्राइवर द्वारा बजाये गये भोजपुरी के गीतों को प्रस्तुत
करते है तो पाठक झूम उठता है। मार्ग में पड़ने वाले साहित्यकारों, कलाकारों के
जन्म स्थानों और कृतियों का उल्लेख कर पुलस्तेय ने इस यात्रा वृतांत को अकेडमिक
बना दिया है।
शाम तक लेखक की
यात्रा एक छोटे बाजार खोरीबारी से बंगाल सीमा में प्रवेश करती है । जहाँ लेखक एक
साहित्यिक अभिरुचि की महिला तपिनी दास के दुकान पर चाय पीने के लिए रुकता है ।
बंगाली महिला
का पति नेपाली है, दुकान के वेटर लड़के मैथिली और भोजपुरिया हैं। यह जानने के बाद
तपिनी दास में लेखक को भारत माता का अक्स दिखने लगता है। फिर बंगला साहित्य और
रसगुल्ले से जुड़ी किंवदंतियाँ पाठक में जिज्ञासा जगाने के साथ मनोरंजन भी करती
हैं। यहाँ से कुछ ही दूर जब गाड़ी नक्सलबाड़ी से गुजरती है तो सहयात्री नन्दलाल की
जिज्ञासा का जवाब बड़ी रोचक शैली देते हुए लेखक कहता है-“बहुत पुराना इतिहास नहीं
है नन्दलाल जी!अभी 1967 तक नक्सलबाड़ी भी एक सामान्य
गाँव था देश के अन्य गाँवों की ही तरह । देश आजाद था,पर गाँवों में जमींदारों का
राज था,क्योंकि जमींदार भी लड़े थे,आजादी के लिए । लड़े तो किसान-मजदूर भी थे,पर
जिसकी जितनी औकात थी उतनी उसको आजादी मिली,आज भी वैसे ही मिल रही है.....” फिर बातों-बातों में लेखक नक्सल आंदोलन की पूरी
कथा कह देता है।
इस तरह यात्रा
के दौरान लेखक अपने को नदी-नालों,प्राकृतिक सुषमा से ही नहीं जोड़ते हैं बल्कि देश
की राजनीतिक,आर्थिक समस्याओं पर संवाद करते चलते हैं। चट्टी-चौराहों पर चाय की
चुस्की लेते हुए समय और समाज की नब्ज भी टटोले चलते हैं।
सिल्लीगुड़ी में
रात्रि विश्राम के बाद महानन्दा नदी से संवाद के बहाने क्षेत्रीय
इतिहास,भूगोल,वर्तमान का दृश्यमय वर्णन के साथ ही स्त्री विमर्श को अद्भुत शैली में
प्रस्तुत किया है-“ महाकाली आदि स्त्री है। सदियाँ लगीं होगीं, आदि स्त्री को लक्ष्मी बनाने में । न जाने कितनी स्तुतियाँ गायी गयी होगी,तब तैयार हुई होगी विष्णु का पाँव दबाने के लिए ।
न जाने कितने श्रृंगार,आभरणों से लुभाया गया होगा,तब तैयार हुई होगी घर बसाने के लिए ।”
अगली सुबह यात्रा
में रास्ता भटक कर लेखक सिक्किम की ओर चला जाता है,फिर सिक्किम का इतिहास,भूगोल,पर्यावरण
और तिस्ता नदी से संवाद भला कैसे छूट सकता
है ? नदी संवाद में नदियों का मानवीकरण कर
लेखन के अभिनव शैली का प्रयोग किया है जैसे-
“ नदी की ओर लगे बैरिकेटिंग के पास खड़े
होकर तिस्ता को निहारने लगा मैं । दो पहाड़ियों के बीच बहते नीलाभ प्रवाह से
निकलकर नीलहरित सौन्दर्य स्वामिनी तीस्ता प्रगट होकर बोल पड़ी -
-क्यों पुलस्तेय! देखा है कहीं ऐसी सुन्दर
नदी,नहीं न ? यदि मैं न होती तो सिक्किम, दार्जलिंग अनजाने
रह जाते दुनिया से । सात हजार मीटर की ऊँचाई पर कैलाश क्षेत्र की पाउहुनरी हीमनद,ज़ेमू हीमनद,चोलामु झीलों से निकलती हूँ । सिक्किम, दार्जलिंग, जलपाईगुड़ी बंगलादेश के जनजीवन को
अभिसिंचित करती 309 किमी चलकर ब्रह्मपुत्र की संगिनी बन जाती
हूँ ।” पढ़कर लगता है यात्रा वृतांत न होकर नदियों की आत्मकथा है यह।
यहाँ से आगे
बढ़ते हुए चाय बागान के मजदूरों,बाक्सा जंगल के टोटो,गारो, मेच जैसे गुमनाम आदिवासी
समुदायों की जीवनशैली-समस्याओं से पर्दा हटाकर,आदिवासी समस्याओं पर सूक्ष्म नजर
रखने वाले पुलस्तेय लोक जीवन में समस्याओं का समाधान ढूँढते नजर आते हैं।
ऐसा नहीं है कि
लेखक अपने यात्रा विमर्श और मनोरम प्राकृतिक परिवेश में खोकर देश-समाज के वर्तमान हालात को भूल गया
है। सोसल मीडिया में मणिपुर में भीड़ द्वारा तीन युवतियों के नग्न परेड और बलात्कार
देख विक्षुब्ध हो जाता है और मणिपुर के इतिहास,भूगोल और वर्तमान पर अपना विचार भी
व्यक्त करते हुए कहता है-
“अपनी स्वंत्रता और संस्कृति के लिए
आदिकाल से संघर्षरत कबीलों को चौसर की आग में झोंक दिया गया है। कुकी और मैतैई
दोनों जल रहे हैं, चौसर के खिलाड़ी चुप-चाप तमाशा देख रहे
हैं। इधर खुद को देश समझने वाले भारतीय इस समस्या के विमुख नारे लगा कर, देशभक्ति
का प्रदर्शन कर रहे हैं,आखिर करें भी क्या करें,जब इतना बड़ा विध्वंस मीडिया से गायब है ।”
इस क्रम में
आगे बढ़ते हुए आदिवासी कबीलों,ग्रामीण बाजार,अंगारभासा तोरसा, कालजानी रैदक,संकोश
नदियों का संवाद बंगाल के एक नये स्वरूप से परिचित तो कराते ही हैं साथ यहाँ की शिक्षा,बेरोजगारी, सरकारों की अव्यवहारिक नीतियों, जमीन से जुड़ी
समस्याओं से भी रूबरू कराते हैं। यात्रा के दौरान पुलस्तेय बार-बार आम जनजीवन से
इतनी गहराई से जुड़ते हैं कि डाक्टर बनने की चाह रखने वाले झारखण्ड के एक गरीब
परिवार युवक को चायबागान में चाय-नाश्ते की दुकान चलाते देखकर व्यथित हो जाते
हैं,पर उसका अपनी संस्कृति से लगाव देखकर भावविभोर हो जाते है। यहाँ पाठक भी लेखक
के भाव सागर में डूबने-उतराने लगता है।
पुलस्तेय की गाड़ी अगले चरण में जब असम में
प्रवेश करती है तो चम्पावती, गदाधर, पगलादिया, बेकी आदि नदियों के संवाद के बहाने असमिया
जनजीवन में रची-बसी लोक कथायओं की अद्भुत दुनिया की सैर कराते हैं। इस बीच
बोडोलैण्ड आन्दोलन के इतिहास और वर्तमान पर चर्चा करते हुए की यात्रा आगे बढ़ती
रहती है।
जब लेखक अपने
गंतव्य गुवाहाटी पहुँचता है तो पिछली यात्राओं में देखा असमी संस्कृति पर्यावरण
समृद्ध गुवाहाटी खोजने लगता है,जो विकास के दौर खो चुका है। ब्रह्मपुत्र नदी से
संवाद के बहाने असम और असम के मूल निवासियों की कला संस्कृति का पर्ते तो खुलती ही
है, ब्रह्मपुत्र का इतिहास भूगोल,पर्यावरण और उससे जुड़ी अनेक पौराणिक, मिथकीय कथाओं
का बयान यात्रा वृतांत को शोधपत्र जैसा बना देता है।
नीलांचल पर्वत पर
कामाख्या देवी मंदिर पहुँच पर कामरूप व देवी पूजा के इतिहास,पुराण, मिथक, रीति-रिवाज,
पर्व-परम्परा,तंत्र,अध्यात्म, दर्शन, और रहस्य
की अनेक खिड़कियाँ खुल जाती हैं। एक खिड़की से झाँकने पर कामाख्या देवी का भोजपुरिया
लोक संस्कृति से गहरा रिश्ता निकल आता है। पश्चिम बिहार,पूर्वी उत्तर प्रदेश में
लगभग सभी लोक शक्ति उपासना स्थल कामाख्या के विग्रह से जुड़े हुए हैं,जो यहाँ के
आदिम जातियों द्वारा कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं। यहाँ पुलस्तेय पूर्वोत्तर
के आदिम संस्कृति का तार उत्तर भारत के आदिम जातियों से जोड़ने की कोशिश में सफल दिखते
हैं।
देवी कामाख्या
का तार भोजपुरी लोक संस्कृति से जोड़ने के संदर्भ में लोक शक्ति उपासना में गाये
जाने वाला ‘पचरा’ गीत उधृत करते हैं-
“अरि कँवरु कमिच्छवा से चले मोर भवानी त
रंथ साजि न,
कइली अढ़ऊल
सिंगार मइया रंथ साजि न,”
भोजपुरिया
इलाके के गाँव-गाँव में देवकी सोखा,कोदई सोखा जैसे लोग पचरा गाकर कामाख्या देवी का
आवाहन करते मिल जायेगें। वामतिमाई, समय माई,परमसुन्दरी माई आदि के रूप में
कामाख्या देवी गाँव-गाँव में विराजमान होकर घर-घर की कुल देवी बनी बैठी हैं। यही सूत्र
पूर्वोत्तर के आदिम जातियों को, भोजपुरिया आदिम जातियों से जोड़कर देश की सांस्कृतिक
एकता को मजबूत करता है।इस विविधा पूर्ण एकता के सूत्र की उपेक्षा कर आज राजनीति
प्रेरित धर्म को पूरे देश पर थोपने की कोशिश की जा रही है,जो निश्चित ही
सांस्कृतिक एकता को कमजोर करेगी । लेखक इस बात पर चिंता व्यक्त करता है।
दूसरी खिड़की से
तिरियाराज में आदमी को तोता,भेड़ बनाने का मिथक टूटने के साथ ही सती की योनिपीठ के
अलावा कामाख्या देवी से जुड़ी अन्य कथाओं का पता भी चलता है। जिसे लेखक अपनी
खिलंदड़ी भाषा में इस प्रकार कहता हैं-
“इसी उधेड़-बुन में सौभाग्य कुण्ड में
बनती-बिगड़ती आकृतियों को निहार रहा था।अचानक भारतीय संस्कृति के अध्येता वासुदेव
शरण अग्रवाल की बात कौंध गयी कि देवी पूजा की शुरुआत निषादों,भीलों,की आदिम कुल
परम्परा से हुई है,जो आगे चलकर शाक्त सम्प्रदाय के रूप में विकसित हो गयी।”
इस बात को आगे
बढ़ाते हुए पुलस्तेय लिखते हैं कि “ इससे संकेत मिलता
है कि गारो,बोडो,किरात कुलों द्वारा इस स्थान पर देवी की पूजा शुरु हुई। यह
परम्परा देश के अन्य हिस्सों की अवर्ण आदिम जातियों निषाद, गोंड, भील,राजभर,खटिक,चमार
जाति में आज भी प्रचलित है। कुछ क्षत्रिय कुलों में भी देवी को बलि देने की
परम्परा है। ”
इस महत्वपूर्ण तथ्य
का उद्घाटन करते हुए वे कहते हैं-
“एक पुरा अभिलेख में गारो भाषा में देवी
कामाख्या को कामेइखा कहा गया है,जो संस्कृत में कामाख्या हो गया है। कालिका पुराण
और योगिनी तंत्र में भी कामाख्या का प्रथम उपासक किरातों का बताया गया है।”
अंतत: पुरातात्विक
साक्ष्य के साथ लेखक यह बताने में सफल हो जाता है कि देवी आदिवासियों की कुलदेवी
कमेइखा हैं,जो सनातन धारा की शास्त्रीय भाषा संस्कृति में कामाख्या हो गया है। कमेइखा
का तात्पर्य आदि जननी हैं,आदिम जातियों की कुलदेवी होने के कारण ही आदिम पूजा पद्धति
के अनुसार आज भी पशुबलि परम्परा है। लेखक की यह खोज देवी कामाख्या के बारे में
प्रचलित पुराणकथा को आरोपित साबित करने के साथ ही संस्कृतियों के अन्तर्भुक्ति
प्रक्रिया का दर्शन भी कराता है ।
लेखक की यात्रा
यहीं नहीं रुकती है,गुवाहाटी बदलते बाजार,अन्य पुरा स्थलों जैसे विशिष्ठो,दस महाविद्या,
उग्रतारा, शुक्लेश्वर अक्लांता, दीर्घेश्वरी के पुरातात्विक महत्व,अहोम,बोडो,कोच
राजाओं, विविध जनजातियों के इतिहास के वे पन्ने भी खोल देता है, जिससे हिन्दी जगत बिल्कुल
अपरिचित सा रहा है। संयोग से यात्रा के समय लेखक को असमिया नववर्ष रंगोली बिहु
देखने का मौका मिल जाता है,जिसका दृश्यात्मक शैली में वर्णन पाठक को सम्मोहित करता
है।
लौटते समय
सहयात्रियों के जिज्ञासा के जवाब में कामाख्या देवी का बौद्ध बज्रयान और तंत्र से
जुड़े रहस्यों का उद्घाटन लेखक को तंत्र,पुराण, साहित्य, इतिहास का गहरा अध्येता
साबित करती हैं।
ऐतिहासिक
पौराणिक और लोक मान्यताओं के ताने बाने में बुनी गयी यह यात्रा कथा मात्र एक
ट्रेवेलाग भऱ नहीं है,अपने काव्यात्मक माधुर्य के कारण पाठक के मन में अटूट
जिज्ञासा पैदा करती है। पाठक अपने जातीय इतिहास से जुड़ कर अनेकता में एकता का
अनुभव करता है। सभ्यता संस्कृति, देश काल की अज्ञानता से पर्दा भी हटता है।
डॉ.आर.अचल का
यह यात्रा वृतांत“ कुरुना से कामाख्या” पूर्वी उत्तर प्रदेश,उत्तर बिहार,बंगाल,असम का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक शोध ग्रंथ बन गया है,जो जिज्ञासुओं,पर्यटकों,शोध छात्रों के निश्चित ही उपयोगी है ।
इस किताब को आद्योपान्त
पढ़ने के बाद एक और बात उभर कर सामने आती है कि पूरब की बंगाली और असमिया संस्कृति
का भोजपुरी जन- जीवन व्यापक प्रभाव है,जबकि पूरब से किसी आक्रमण या जन समुदाय के
आगमन होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। इधर खैबर और बेलन दर्रों से काफी इन्फिल्ट्रेशन हुआ है पर हम उतना
प्रभावित नहीं हुए जितना कि पूरब से ।
यह डॉ.आर.अचल
की लेखकीय क्षमता है कि मात्र 1100 किलोमीटर की यह यात्रा कथा पाठक को सहयात्री
बनाकर आनन्दाभूति कराती भारत के बहुवर्णी विविधता में एकता के अनेक सूत्रों का
अन्वेषण करती है,जो निश्चय ही लोकप्रियता का प्रतिमान स्थापित करेगी ।
(उद्भव मिश्र,
जनसंस्कृति मंच उप्र पार्षद व वरिष्ठ समीक्षक है)
लेखक-अचल पुलस्तेय
आईएसबीएन :978-93-5545-845-2
मूल्य:₹ 600/

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