कुरुना : जब एक नदी नाला बना दी गई✒️

Public Discourse

Date : 17 January 2026

Author : Achal Pulastey


अभी एक मजार के साथ कुरुना नाला। नदी का बार -बार उल्लेख किया गया लेकिन कुरुना नाला जो एक मृत नदी है। यदि सरकारी अतिक्रमण खाली कराया जा सकता है तो कुरुना नदी जिन्दा क्यो नही हो सकती है?

पूर्वी उत्तर प्रदेश की अनेक लघु नदियाँ आज मृतप्राय अथवा नालों में परिवर्तित हो चुकी हैं। देवरिया जनपद की कुरुना नदी इसका सशक्त उदाहरण है। यह शोध-पत्र कुरुना नदी को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता-संस्कृति के वाहक के रूप में देखने का प्रयास करता है। अध्ययन में लोककथाओं, बौद्ध साहित्य, ऐतिहासिक यात्रा-वृत्तांतों (विशेषतः ह्वेनसांग), पर्यावरणीय रिपोर्टों तथा तटीय समाज की सांस्कृतिक संरचना के आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि कुरुना कभी एक स्वतंत्र और प्रवाही नदी थी, जो कालांतर में जल-अपहरण तथा आधुनिक विकासजनित हस्तक्षेपों के कारण मृत नदी में परिवर्तित हो गई। शोध यह भी स्पष्ट करता है कि नदी के भौतिक क्षय के बावजूद उससे जुड़ी सभ्यता, देवी-पूजा, आजीविका परंपराएँ और लोक-स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं। इस प्रकार कुरुना की कथा आधुनिक विकास मॉडल की आलोचना और वैकल्पिक, पर्यावरण-संवेदी दृष्टि की माँग प्रस्तुत करती है।


देवरिया नगर से उत्तर-पश्चिम में  एक मंद प्रवाहित गंदली सी जलधारा मिलती है, जिसे आज लोग कुरुना नाला कहते हैं। लेकिन बुजुर्गों की स्मृति में यह कभी एक नदी थी—इतनी जीवित कि उसे पुरुष मानकर सरयू से उसका विवाह तक रचा गया। लोककथा है कि भादो की बरसात में उफनती कुरुना विवाह का प्रस्ताव लेकर सरयू के पास जाती है। सरयू मुस्कराकर कहती है—“भादो में विवाह के मुहूर्त नहीं होते, वैशाख-जेठ में आना।” और वैशाख आते-आते कुरुना सूख जाती है। आज तक यह विवाह नहीं हो पाया।

यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे विकास-बोध पर तीखा व्यंग्य है। जिस नदी को हमने नाला मान लिया, वह दरअसल हमारी सामूहिक स्मृति से ही बाहर कर दी गई।

किसी भी नगर के लिए नदी सिर्फ गंदगी बहाने का साधन नहीं होती। वह नगर की साँस होती है—जल, तालाब, हरियाली और जीवन का संतुलन। लेकिन कुरुना के साथ ठीक उलटा हुआ। इसके पाट-पेट पर कब्जा कर घर बना लिए गए। सरकारी रिकॉर्ड में यह नाला बन गई और लोगों की नज़र में कचरा ढोने की नली। फिर जब बरसात में पानी अपना रास्ता खोजता है, तो वही लोग बाढ़ और आपदा का शोर मचाने लगते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि बौद्ध साहित्य में कुरुना का उल्लेख करुणा नदी के रूप में मिलता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने हिरण्यावती नदी का वर्णन किया है, जिसके तट पर बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ। उसी संदर्भ में करुणा का भी जिक्र आता है। आज हिरण्यावती और कुरुना—दोनों ही मृतप्राय हैं। माना जाता है कि कालांतर में जल-अपहरण की प्रक्रिया के तहत छोटी गंडक का जन्म हुआ और इन नदियों का पानी उससे छिन गया। यह तो प्राकृतिक प्रक्रिया थी, लेकिन आधुनिक दौर में जो हो रहा है, वह सीधी हत्या है—बाँध, उद्योग और ज़हरीला कचरा।

कुरुना नदी कुशीनगर जनपद के हाटा तहसील के निकट स्थित तालाब से निकलकर लगभग 60 किमी की यात्रा करती है। यह देवरिया नगर से होकर बहती हुई अंततः राप्ती और सरयू में मिल जाती है। यद्यपि आज इसे नाला कहा जाता है, किंतु इसका विस्तृत पाट और बाढ़ प्रवृत्ति इसके नदी होने के प्रमाण हैं।


बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण एशिया में हर पाँच साल में एक नदी मर रही है। कुरुना अकेली नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की वरुणा, असि, हिरण्यावती, परेन और नकटा जैसी नदियाँ भी इसी हश्र का शिकार हैं। बनारस को वरुणा और असि के संगम के कारण ही वाराणसी कहा गया, लेकिन आज असि एक नाले में सिमट गई है।

कुरुना के तट पर रहने वाले निषाद, बिन्द और मल्लाह समुदायों की ज़िंदगी कभी नदी से जुड़ी थी। मछली पकड़ना और बोरो धान की खेती उनका मुख्य सहारा थी। बोरो धान भारत का प्राचीन धान है—आयुर्वेद में वर्णित, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी। लेकिन चीनी मिल के अपशिष्ट, फिर पेपर मिल और अब शराब फैक्ट्री के ज़हरीले पानी ने न नदी छोड़ी, न खेती। बोरो तीस साल पहले खत्म हो गया और अब मछलियाँ भी दम तोड़ रही हैं।

फिर भी, एक बात है जो कुरुना को पूरी तरह मरा नहीं होने देती—उसकी संस्कृति। इसके तट पर वामति माई, देई माई, बगही माई, काली माई जैसे देवी-स्थल आज भी जीवित हैं। बलि, महुआ से बनी शराब, कुलदेवी की पूजा—ये सब आज भी होते हैं। लोग पक्के घरों में रहने लगे हैं, मोबाइल और मोटरसाइकिल आ गई है, लेकिन अंतिम आस्था आज भी अपनी देवी में है।यही बताता है कि नदी मरती है, संस्कृति नहीं।

असल सवाल यह है कि क्या यही विकास है—नदियों को मारकर, स्मृतियों को नकारकर, और फिर सूखे-बाढ़ पर रोने वाला विकास? कुरुना हमें आईना दिखाती है। किताबों और सोशल मीडिया की बहसों से अलग, ज़मीन पर आज भी सभ्यता धड़क रही है।

हो सकता है हमने कुरुना को नाला बना दिया हो,लेकिन कुरुना ने अब तक हमें छोड़ा नहीं है।

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