धार्मिक उफान और आयातित विज्ञान–तकनीक: एक समानुपाती संबंध

Editorial

Date : 18 January 2026

Editor-in-Chief :


समकालीन समाज में यदि किसी एक प्रवृत्ति ने सबसे अधिक विरोधाभासी प्रश्न खड़े किए हैंतो वह है—धार्मिक उफान और विज्ञान–तकनीक के आयात का साथ–साथ बढ़ना। देखने में ये दोनों धाराएँ एक-दूसरे के प्रतिलोम लगती हैंकिंतु व्यवहार में वे गहराई से एक-दूसरे पर आश्रित हैं।





आज धर्म जिस रूप में सार्वजनिक जीवन में उपस्थित हैवह केवल आस्था या परंपरा का परिणाम नहीं हैबल्कि आयातित तकनीक पर तैरता हुआ धर्म है। यहाँ तक कि धार्मिक उफान भी अपनी गतिविस्तार और प्रभाव के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर हो चुका है। किसी भी धर्म के बड़े धार्मिक आयोजन—चाहे वह कुंभ होकांवड़ यात्रातीर्थाटनपर्व–उत्सव या महायज्ञ—उनका संचालन ड्रोन कैमरोंउपग्रह संचारएलईडी स्क्रीनसाउंड सिस्टमडिजिटल निगरानीएआई-आधारित भीड़ प्रबंधन और वैश्विक प्रसारण तकनीकों के बिना अब संभव नहीं रह गया है।
धर्म स्थलों के सुंदरीकरण और भव्यता–प्रदर्शन में भी आयातित तकनीक की निर्णायक भूमिका है। संगमरमर की चमकलाइट–एंड–साउंड शोआर्टिफिशियल लैंडस्केपिंगरोबोटिक सेवाएँडिजिटल दर्शनऑनलाइन प्रसाद और वर्चुअल पूजा—ये सभी उस तकनीकी संस्कृति की उपज हैंजो स्थानीय धार्मिक चेतना से नहींबल्कि वैश्विक बाज़ार और आयातित तकनीकी मॉडल से आई है। विडंबना यह है कि जिस तकनीक को कभी ‘भौतिकवादी’ और ‘पश्चिमी’ कहकर संदेह की दृष्टि से देखा जाता थावही आज धर्म की वैधताआकर्षण और विस्तार का मुख्य आधार बन चुकी है।


यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक धार्मिक उफान परंपरा का स्वाभाविक विस्तार नहींबल्कि तकनीक–समर्थित भावनात्मक उभार है। सोशल मीडियामोबाइल ऐपडिजिटल दान प्रणाली और एल्गोरिदमिक प्रचार ने धर्म को पहले से कहीं अधिक दृश्यआक्रामक और उपभोक्ता–अनुकूल बना दिया है। इस प्रकार विज्ञान–तकनीक धर्म का विरोधी नहीं रहाबल्कि उसका सबसे प्रभावी वाहक बन गया है।
यही कारण है कि आयातित तकनीक जितनी तीव्रता से समाज में प्रवेश करती हैधार्मिक उफान उतनी ही तीव्रता से उभरता है। तकनीक मनुष्य को सुविधा और शक्ति देती हैपर अर्थ नहींऔर अर्थ की यह रिक्तता धर्म भर देता है। इसीलिए धर्म और आयातित विज्ञान–तकनीक के बीच विरोध नहींबल्कि समानुपाती संबंध दिखाई देता है।
समस्या न धर्म में हैन विज्ञान में—समस्या उस विकास मॉडल में है जो तकनीक को संस्कृति से काट देता है और धर्म को आत्मालोचना से वंचित कर देता है। जब तक विज्ञान स्वदेशी चेतना से और धर्म मानवीय विवेक से नहीं जुड़तातब तक यह गठजोड़ समाज को संतुलन नहींबल्कि उन्माद और यांत्रिकता की ओर ही ले जाएगा।


आस्था का मंच और मशीनों का शोर


हम ऐसे समय में खड़े हैं जहाँ मंदिरों की घंटियाँ अब अकेली नहीं बजतींउनके साथ ड्रोन की भनभनाहटएलईडी स्क्रीन की चमक और कैमरों की लाल बत्तियाँ भी जलती रहती हैं। यह दृश्य केवल भक्ति का नहींबल्कि हमारे समय की उस संरचना का है जहाँ धर्मतकनीक और सत्ता एक ही मंच पर खड़े दिखाई देते हैं—एक-दूसरे को सहारा देते हुए।
धार्मिक उफान को अक्सर परंपरा का पुनर्जागरण कहा जाता हैलेकिन यह पुनर्जागरण कम और आधुनिक प्रबंधन का परिणाम अधिक लगता है। आज आस्था पैदल नहीं चलतीवह उपग्रहों पर सवार है। वह साधना की गति से नहींबल्कि इंटरनेट की स्पीड से फैलती है। किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन को देखिए—वह कम तीर्थ और अधिक उत्सव–उद्घाटन जैसा लगता हैजहाँ श्रद्धा से अधिक दृश्यता का महत्व है।
यहाँ एक दिलचस्प दृश्य बनता है। जिन मशीनों को कभी ‘पश्चिमी’ कहकर संदेह की दृष्टि से देखा जाता थावही मशीनें आज आस्था की रक्षा–पंक्ति में खड़ी हैं। विदेशी कैमरे धर्म को पवित्र बनाते हैंआयातित लाइटें उसे दिव्य बनाती हैं और वैश्विक प्लेटफॉर्म उसे सर्वव्यापी। लगता है जैसे धर्म ने अब अपना नया वाहन चुन लिया है—वह वाहन जो शोर करता हैचमकता है और दूर तक दिखाई देता है।
रूपक में कहें तो आज धर्म नदी नहीं रहाजो भीतर से बहती हैवह झील बन गया हैजिसे चारों ओर से सीमेंट से सजाया गया है। पानी अभी भी हैपर प्रवाह नहीं। और इस झील के किनारे सत्ता ने अपने मंच सजा लिए हैं—जहाँ उद्घाटन होते हैंतस्वीरें खिंचती हैं और भावनाएँ सुरक्षित दूरी से नियंत्रित की जाती हैं।
तकनीक यहाँ केवल साधन नहींकथावाचक बन गई है। वह तय करती है कि कौन सा दृश्य दिखेगाकौन सा भाव उभरेगा और कौन सा प्रश्न गायब हो जाएगा। जो दृश्य जितना भव्यउतना ही सत्य मान लिया जाता है। और जब दृश्य सत्य बन जाएतो प्रश्न अनावश्यक लगने लगते हैं।
इसी बीचवास्तविक जीवन के प्रश्न—रोटीरोज़गारशिक्षास्वास्थ्य—धीरे-धीरे पर्दे के पीछे खिसक जाते हैं। मंच पर रोशनी इतनी तेज़ होती है कि अँधेरा दिखाई ही नहीं देता। नागरिक दर्शक बन जाता है और दर्शक से अपेक्षा होती है कि वह ताली बजाएसवाल नहीं पूछे।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज आस्था को भीड़–अनुकूल अनुभव में बदला जा रहा है। धर्म अब आत्मसंवाद नहींसामूहिक दृश्य है। तकनीक उसे फैलाती है और सत्ता उसे अर्थ देती है। इस साझेदारी में धर्म को भावनात्मक ऊर्जा मिलती है और सत्ता को स्थायित्व।
लेकिन हर रूपक की तरह यहाँ भी एक दरार है। मशीनें अर्थ नहीं रचतींवे केवल उसे चमकाती हैं। और चमक के नीचे यदि खोखलापन होतो देर–सवेर वह दिखाई देने लगता है। जिस दिन दर्शक फिर से नागरिक बनकर सवाल पूछने लगेगाउस दिन यह मंच डगमगाएगा।
समस्या आस्था में नहीं है। समस्या उस व्यवस्था में है जो आस्था को सजावट बना देती है और तकनीक को विवेक से अलग कर देती है। यदि विज्ञान प्रश्न पूछने की हिम्मत लौटाए और धर्म करुणा की भाषा फिर से सीखेतो शायद यह शोर कुछ कम हो सके।
अन्यथामशीनें चलती रहेंगीरोशनियाँ जलती रहेंगी और मंच पर उत्सव बना रहेगा—लेकिन समाज भीतर ही भीतर थकता चला जाएगा।



Editorial Archive

Related Articles

Post a Comment

0 Comments