समकालीन समाज में यदि किसी एक प्रवृत्ति ने सबसे अधिक
विरोधाभासी प्रश्न खड़े किए हैं,
तो वह है—धार्मिक उफान और विज्ञान–तकनीक के आयात का साथ–साथ बढ़ना।
देखने में ये दोनों धाराएँ एक-दूसरे के प्रतिलोम लगती हैं, किंतु
व्यवहार में वे गहराई से एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
आज धर्म जिस रूप में सार्वजनिक जीवन में उपस्थित है, वह केवल आस्था
या परंपरा का परिणाम नहीं है, बल्कि आयातित तकनीक पर
तैरता हुआ धर्म है। यहाँ तक कि धार्मिक उफान भी अपनी गति, विस्तार और प्रभाव के लिए विदेशी तकनीक पर निर्भर हो चुका है। किसी भी
धर्म के बड़े धार्मिक आयोजन—चाहे वह कुंभ हो, कांवड़ यात्रा,
तीर्थाटन, पर्व–उत्सव या महायज्ञ—उनका संचालन
ड्रोन कैमरों, उपग्रह संचार, एलईडी
स्क्रीन, साउंड सिस्टम, डिजिटल निगरानी,
एआई-आधारित भीड़ प्रबंधन और वैश्विक प्रसारण तकनीकों के बिना अब
संभव नहीं रह गया है।
धर्म स्थलों के सुंदरीकरण और भव्यता–प्रदर्शन में भी
आयातित तकनीक की निर्णायक भूमिका है। संगमरमर की चमक, लाइट–एंड–साउंड
शो, आर्टिफिशियल लैंडस्केपिंग, रोबोटिक
सेवाएँ, डिजिटल दर्शन, ऑनलाइन प्रसाद
और वर्चुअल पूजा—ये सभी उस तकनीकी संस्कृति की उपज हैं, जो
स्थानीय धार्मिक चेतना से नहीं, बल्कि वैश्विक बाज़ार और
आयातित तकनीकी मॉडल से आई है। विडंबना यह है कि जिस तकनीक को कभी ‘भौतिकवादी’ और
‘पश्चिमी’ कहकर संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, वही आज
धर्म की वैधता, आकर्षण और विस्तार का मुख्य आधार बन चुकी है।
यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक धार्मिक उफान परंपरा का स्वाभाविक
विस्तार नहीं, बल्कि तकनीक–समर्थित भावनात्मक उभार है। सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप, डिजिटल दान प्रणाली और एल्गोरिदमिक
प्रचार ने धर्म को पहले से कहीं अधिक दृश्य, आक्रामक और
उपभोक्ता–अनुकूल बना दिया है। इस प्रकार विज्ञान–तकनीक धर्म का विरोधी नहीं रहा,
बल्कि उसका सबसे प्रभावी वाहक बन गया है। यही कारण है कि आयातित तकनीक जितनी तीव्रता से समाज में प्रवेश
करती है, धार्मिक उफान उतनी ही तीव्रता से उभरता है। तकनीक मनुष्य को सुविधा और
शक्ति देती है, पर अर्थ नहीं; और अर्थ
की यह रिक्तता धर्म भर देता है। इसीलिए धर्म और आयातित विज्ञान–तकनीक के बीच विरोध
नहीं, बल्कि समानुपाती संबंध दिखाई देता है। समस्या
न धर्म में है, न विज्ञान में—समस्या उस विकास मॉडल में है जो तकनीक को संस्कृति से काट
देता है और धर्म को आत्मालोचना से वंचित कर देता है। जब तक विज्ञान स्वदेशी चेतना
से और धर्म मानवीय विवेक से नहीं जुड़ता, तब तक यह गठजोड़
समाज को संतुलन नहीं, बल्कि उन्माद और यांत्रिकता की ओर ही
ले जाएगा।
आस्था का मंच और मशीनों का शोर
हम ऐसे समय में खड़े हैं जहाँ मंदिरों की घंटियाँ अब अकेली
नहीं बजतीं; उनके साथ ड्रोन की भनभनाहट, एलईडी स्क्रीन की चमक और
कैमरों की लाल बत्तियाँ भी जलती रहती हैं। यह दृश्य केवल भक्ति का नहीं, बल्कि हमारे समय की उस संरचना का है जहाँ धर्म, तकनीक
और सत्ता एक ही मंच पर खड़े दिखाई देते हैं—एक-दूसरे को सहारा देते हुए। धार्मिक उफान को अक्सर परंपरा का पुनर्जागरण कहा जाता है, लेकिन यह
पुनर्जागरण कम और आधुनिक प्रबंधन का परिणाम अधिक लगता है। आज आस्था पैदल
नहीं चलती; वह उपग्रहों पर सवार है। वह साधना की गति से नहीं,
बल्कि इंटरनेट की स्पीड से फैलती है। किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन को
देखिए—वह कम तीर्थ और अधिक उत्सव–उद्घाटन जैसा लगता है, जहाँ
श्रद्धा से अधिक दृश्यता का महत्व है। यहाँ एक दिलचस्प दृश्य बनता है। जिन मशीनों को कभी ‘पश्चिमी’
कहकर संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, वही मशीनें आज आस्था की रक्षा–पंक्ति में खड़ी
हैं। विदेशी कैमरे धर्म को पवित्र बनाते हैं, आयातित लाइटें
उसे दिव्य बनाती हैं और वैश्विक प्लेटफॉर्म उसे सर्वव्यापी। लगता है जैसे धर्म ने
अब अपना नया वाहन चुन लिया है—वह वाहन जो शोर करता है, चमकता
है और दूर तक दिखाई देता है। रूपक में कहें तो आज धर्म नदी नहीं रहा, जो भीतर से
बहती है; वह झील बन गया है, जिसे चारों
ओर से सीमेंट से सजाया गया है। पानी अभी भी है, पर प्रवाह
नहीं। और इस झील के किनारे सत्ता ने अपने मंच सजा लिए हैं—जहाँ उद्घाटन होते हैं,
तस्वीरें खिंचती हैं और भावनाएँ सुरक्षित दूरी से नियंत्रित की जाती
हैं। तकनीक यहाँ केवल साधन नहीं, कथावाचक बन गई
है। वह तय करती है कि कौन सा दृश्य दिखेगा, कौन सा भाव
उभरेगा और कौन सा प्रश्न गायब हो जाएगा। जो दृश्य जितना भव्य, उतना ही सत्य मान लिया जाता है। और जब दृश्य सत्य बन जाए, तो प्रश्न अनावश्यक लगने लगते हैं। इसी बीच,
वास्तविक जीवन के प्रश्न—रोटी, रोज़गार,
शिक्षा, स्वास्थ्य—धीरे-धीरे पर्दे के पीछे
खिसक जाते हैं। मंच पर रोशनी इतनी तेज़ होती है कि अँधेरा दिखाई ही नहीं देता।
नागरिक दर्शक बन जाता है और दर्शक से अपेक्षा होती है कि वह ताली बजाए, सवाल नहीं पूछे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज आस्था को भीड़–अनुकूल
अनुभव में बदला जा रहा है। धर्म अब आत्मसंवाद नहीं, सामूहिक दृश्य
है। तकनीक उसे फैलाती है और सत्ता उसे अर्थ देती है। इस साझेदारी में धर्म को
भावनात्मक ऊर्जा मिलती है और सत्ता को स्थायित्व। लेकिन हर रूपक की तरह यहाँ भी एक दरार है। मशीनें अर्थ नहीं
रचतीं; वे केवल उसे चमकाती हैं। और चमक के नीचे यदि खोखलापन हो, तो देर–सवेर वह दिखाई देने लगता है। जिस दिन दर्शक फिर से नागरिक बनकर
सवाल पूछने लगेगा, उस दिन यह मंच डगमगाएगा। समस्या आस्था में नहीं है। समस्या उस व्यवस्था में है जो आस्था
को सजावट बना देती है और तकनीक को विवेक से अलग कर देती है। यदि विज्ञान प्रश्न
पूछने की हिम्मत लौटाए और धर्म करुणा की भाषा फिर से सीखे, तो शायद यह
शोर कुछ कम हो सके। अन्यथा,
मशीनें चलती रहेंगी, रोशनियाँ जलती रहेंगी और
मंच पर उत्सव बना रहेगा—लेकिन समाज भीतर ही भीतर थकता चला जाएगा।
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