Public Discourse
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Author :डॉ.चतुरानन ओझा
The Costly Truth of Sanctions and Cheap Imports: Self-Reliance or Economic Surrender?
In the changing landscape of global politics and economics, sanctions imposed by powerful nations often create immediate hardship, but they can also serve as catalysts for self-reliance if supported by strong political will and effective policies. History demonstrates that countries such as China, Iran, and Cuba have transformed external pressure into internal strength. China, once isolated and facing strained relations with major powers, invested in domestic production and technology, eventually emerging as a global economic powerhouse. Similarly, Iran and Cuba have sustained their sovereignty by strengthening internal capabilities despite prolonged restrictions. India, too, has experienced this dynamic. During the nuclear tests under Indira Gandhi and Atal Bihari Vajpayee, international sanctions pushed India to develop indigenous technologies like cryogenic engines and supercomputers. These achievements highlight how adversity can drive innovation and national capability when supported by clear policy direction. However, the present situation reflects a contradiction. Economic liberalization led India toward increasing import dependence. While beneficial during stable times, this model exposes serious vulnerabilities during global disruptions. Dependence on foreign sources for energy, defense equipment, electronics, and raw materials weakens both economic resilience and strategic security. This condition is not only externally driven but also rooted in domestic policy choices. Small, cottage, and medium industries—once the backbone of India’s economy—have been neglected. Traditional manufacturing clusters and artisan skills were marginalized, even dismissed as inferior, while similar goods are now imported and dominate domestic markets. The way forward requires a shift from rhetoric to action: revitalizing local industries, investing in research and innovation, and restoring confidence in indigenous production. Ultimately, true sovereignty depends on self-reliance; import dependence may offer short-term gains but undermines long-term stability and national strength. p>
वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के बदलते परिदृश्य में “किसी देश पर समृद्ध देशों द्वारा कूटनीतिक दबाव के लिए प्रतिबंध लगाने से तात्कालिक परेशानी तो होती है परन्तु मजबूत इच्छा शक्ति और सशक्त नीतियों से राष्ट्र की आंतरिक शक्ति और आत्मनिर्भरता का अवसर भी होता है। सामान्यतः प्रतिबंधों को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है, किंतु इतिहास की नजरिये से देखे तो कि यही प्रतिबंध कई देशों के लिए आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी सिद्ध हुए हैं।
वर्तमान में ईरान, क्यूबा और चीन इसके सशक्त उदाहरण हैं, एक समय था कि चीन जापान से आजाद हुआ था, अमेरिका, रूस से नाटो और सोवियत यूनियन दोनों से प्रतिबंधित था। भारत से 1962 का युद्ध लड़कर रिश्ते खराब हो चुके थे। ऐसी स्थिति में आत्मनिर्भता के अलाव कोई विकल्प नहीं है। परन्तु आज महाशक्ति बनने की स्थिति में है। दुनिया के बाजार चीन पर निर्भर हो गया है। बाहरी दबावों और प्रतिबंधों को अपनी आंतरिक क्षमता के विकास में परिवर्तित लिया है। क्यूबा भी मजबूत देशों के सामने तन कर खड़ा है। वर्तमान युद्ध ईरान की क्षमता से दुनिया चकित है। इन देशों ने सीमित संसाधनों के बावजूद उत्पादन, तकनीक और अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की।
भारत के संदर्भ में भी देखें तो इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में परमाणु परीक्षण के समय प्रतिबंधों को अवसर के रूप में लिया था । ऐसी ही परिस्थियों में क्रायोजेनिक इंजन का विकास, सुपर कंप्यूटर निर्माण आत्मनिर्भरता के प्रतीक हैं। सही नीतिगत फैसले प्रतिबंधों के बीच भी राष्ट्र को आगे बढ़ाने का अवसर देते है।
किन्तु आज की स्थिति एक गहरी विडंबना को उजागर करती है। आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत ने अपने आयात के द्वार व्यापक रूप से खोल दिए। प्रारंभ में यह वैश्विक जुड़ाव और विकास का माध्यम प्रतीत हुआ, किंतु धीरे-धीरे यह आयात-निर्भरता में परिवर्तित हो गया। आज हम उस स्थिति में पहुँच गए हैं जहाँ युद्धकालीन या वैश्विक संकट की परिस्थितियों में आर्थिक संकट झेलना हमारी विवशता बन चुकी है।
यह कटु सत्य है कि शांति काल में सस्ता आयात हमें लाभकारी लगता है, लेकिन जैसे ही आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, हमारी आर्थिक संरचना की कमजोरियाँ उजागर हो जाती हैं। ऊर्जा, रक्षा सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल के लिए बाहरी निर्भरता हमें रणनीतिक रूप से भी कमजोर बनाती है। जो केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवालिया निशान छोड़ देता है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह स्थिति केवल बाहरी कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि अपनी नीतिगत चूकों का भी दुष्परिणाम होता है। आत्मनिर्भरता के स्थान पर आयात-आधारित विकास मॉडल को प्राथमिकता देना किसी भी देश की सम्प्रभुता को खतरे में डाल देती है।। लघु, कुटीर और मध्यम उद्योग. जो कभी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे । उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के नाम पर असुरक्षित छोड़ दिया गया। वैश्विक कार्पोरेट के दबाव जमुनानगर,लुधियाना, दिल्ली, उल्हासनगर(मुम्बई), सिवान और कोलकाता जैसे क्षेत्रों में पनपने वाली कारीगर संस्कृति को हमने अवैध घोषित कर दिया। इसी बल पर चीन दुनिया सबसे बड़ा तकनीकी उत्पादक बन बैठा है। इसके विपरीत भारत में धीरे-धीरे खत्म हो चुकी है। मुझे नहीं लगता है इस क्षेत्रों उत्पाद किसी भी तरह चीनी उत्पादों से कम थे, लेकिन हमने उन उत्पादों को “दो नंबर” या नकली कह कर खारिज कर दिया । आज वही वस्तुएँ चीन से आयात होकर हमारे बाजारों पर छाई हुई हैं। यह केवल व्यापारिक पराजय नहीं, बल्कि हमारी स्वदेशी क्षमता के प्रति उदासीनता का प्रमाण है। हमने अपने कारीगरों की दक्षता को विकसित करने के बजाय उन्हें हाशिए पर धकेल दिया और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उपभोक्ता बनकर विकास का ढिढ़ोरा पीट रहे हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि आत्मनिर्भरता को केवल नारे तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे व्यवहारिक नीति में परिवर्तित किया जाए। इसके लिए लघु एवं कुटीर उद्योगों का पुनर्जीवन, स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन, और अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश अनिवार्य है। साथ ही, उपभोक्ताओं में स्वदेशी उत्पादों के प्रति विश्वास और सम्मान विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हमारे देश नीजी क्षेत्रों में तमनीकी- गैर तकनीकी विश्वविद्यालयों, संस्थानों की बाढ़ सी आयी है, पर किसी ने अभी तक कोई ऐसा काम नहीं किया जिसे आत्मनिर्भर होने का संकेत भी मिल सके। कोरोना के समय पूरी दुनिया वैक्सिन पर करोड़ो खर्च कर रही थी,हम लाकडाउन कर संतुष्ट थे। आखिर विदेशी वैक्सिन का सस्ते श्रम की वजह भारत उत्पादित कर खुश हो गये। जबकि हमारे यहाँ प्रतिभाओं और संस्थानों की कोई कमी नहीं थी। यह अहम सवाल है कि जब किसी देश ने क्रियोजेनिक इंजन और सुपर कम्यूटर की तकनीक देने को तैयार नहीं हुआ तो हमारे वैज्ञानिकों स्वदेशी बना लिया, तो आज क्यों नहीं हो सकता है। शायद इसलिए संभव नहीं कि हमारी नीतियाँ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अधीन हो चुकी हैं।
अंततः, प्रतिबंध हों या युद्धकालीन संकट—दोनों ही परिस्थितियाँ हमें एक स्पष्ट संदेश देती हैं: जो राष्ट्र आत्मनिर्भर नहीं है, वह पूर्णतः स्वतंत्र व सम्प्रभु भी नहीं हो सकता। आयात-निर्भरता हमें अल्पकालिक सुविधा तो दे सकती है, किंतु दीर्घकालिक स्थिरता और स्वाभिमान नहीं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस चुनौती को विवशता के रूप में स्वीकार करें या इसे आत्मनिर्भरता के एक नए युग के आरंभ का सूत्रपात करें।
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