Book Review
Date : 23 March 2025
Reviewer : उद्भव मिश्र
Title : रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़ (उपन्यास)
Author : अचल पुलस्तेय
Publisher : नम्या प्रेस,नई दिल्ली
Year : 2023
Price : ₹600
ISBN : 978-93-5545-191-0
ग्रामीण जीवन के क्षरणशील मूल्यों का सजीव चित्र और उन तत्वों की तलाश जो मिज़ोरम और भोजपुरी जीवन में समान रूप से उपस्थित है, जिसके अध्ययन के लिए पृष्ठभूमि तैयार करती है यह किताब। नायिका पुई की भाव-विह्वल विदाई विकसित वर्ग की संवेदना पर ढेर सारे सवाल भी छोड़ जाती है। यह कहानी इस उत्तर आधुनिक भारत में समरसता और सामुदायिकता के अंत की गाथा भी है। विघटन के दौर में ऐसी कृति का आना एक आशा की किरण जैसा है। राष्ट्र की एकता की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष पहचानने के लिए विविधता को जानना आवश्यक है और इसके लिए “रिसर्च इन तप्पाडोमागढ़” जैसी कृतियाँ महत्वपूर्ण हैं।
अचल पुलस्तेय के उपन्यास “रिसर्च इन तप्पा डोमागढ़” की शुरुआत सुदूर पूर्व मिजोरम निवासी जेएनयू की शोध छात्रा लल्लीम पुई के सवाल से होती है। जिसका जवाब भोजपुरी इलाके के गाँव तप्पाडोमागढ़ के लोक-आस्था केन्द्र वामाई माई देवगढ़ के अनपढ़ सेवक देवकी सोखा अपनी आस्था के प्रतिफल से देते हैं।
“ई दुनिया विश्वास पर टिकी है बाबू! आप पढ़े-लिखे लोग को जितना विश्वास अपनी किताब, वेद-शास्त्र पर है, उतना ही मुझे वामति माई पर है।”
“संजय! हम भी उतने ही भारतीय हैं, जितने तुम हो। दोनों की एक समस्या यह है कि हम भारत की समग्रता से अनभिज्ञ हैं।”
लल्लीम पुई एक भोजपुरिया गाँव का सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक अध्ययन करते हुए विविध संस्कृतियों के जंगल में प्रवेश करती है। कथा तप्पोडोमागढ़ से मिजोरम के गाँव गुलसिल तक पहुँचती है और भारतीय संस्कृति की बहुस्तरीय संरचना को उद्घाटित करती है।
यह उपन्यास स्थापित करता है कि भारतीय संस्कृति कोई एकरूपी संरचना नहीं, बल्कि अनेक संस्कृतियों का समुच्चय है। कथित मुख्यधारा के नीचे दबे लोक-संस्कारों और कुल-परम्पराओं को लेखक ने अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।
लेखक ने वर्ण-व्यवस्था, छुआछूत, सांस्कृतिक अंतर्भुक्ति और सामाजिक विडम्बनाओं को शोधपरक दृष्टि से चित्रित किया है। यह कृति केवल उपन्यास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अध्ययन का महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है।
देवकी सोखा के लोक मंत्र में सांस्कृतिक समन्वय की अद्भुत झलक मिलती है—
कामरु देश कमीक्षा देवी जहाँ बसे ईस्माईल जोगी
ईस्माईल जोगी की लगी फुलवारी
फूल लोढ़े लोना चमारिन
वामति लेई वोहि फूल की सुबास
कल्यानी कल्यान कर
सारा धरती आकाश आग हवा नीर-क्षीर बसे तुहीं माई
दुहाई कमरु कमिक्षा माई की, दुहाई लोना चमारिन की।
यह शाबर मंत्र दर्शाता है कि लोक-संस्कृति में मुसलमान, दलित, आदिवासी और देवी-आस्था एक ही सूत्र में बँधे हैं।
वर्तमान समस्याएँ—बेरोजगारी, महामारी, पलायन, शहरीकरण, सामाजिक विघटन—सब इस उपन्यास में जीवंत रूप में उपस्थित हैं। नायिका प्रेम-केंद्रित नहीं, बल्कि ज्ञान-केंद्रित है, जो इसे विशिष्ट बनाता है।
तप्पा डोमागढ़ किसी एक गाँव का नाम नहीं, बल्कि भारत की बहुसांस्कृतिक संरचना का प्रतीक है।
International Society for Folk Narrative Research (ISFNR) के विद्वानों ने कहा है—“There are so many nationalities in India.” यह उपन्यास उस कथन को जीवंत प्रमाण देता है।
This book is recommended for scholars, students and readers interested in interdisciplinary discussions related to science, society and knowledge traditions.
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