डॉ.दुष्यंत कुमार शाह1
1किरोड़ी मल कालेज,दिल्ली, दिल्ली
विश्वविद्यालय दिल्ली.
सारांश
आज
योग पर बहस केवल स्वास्थ्य या व्यायाम तक सीमित नहीं रह गई है,
बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का विषय बन चुका है।
कोई इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर मानता है, कोई हिन्दुत्व की पहचान, तो कोई आधुनिक चिकित्सा पद्धति का हिस्सा। सोशल मीडिया
और जन विमर्शों में योग को लेकर समर्थन और विरोध दोनों मौजूद हैं।
ऐतिहासिक
दृष्टि से योग का विकास किसी एक धर्म या जाति की देन नहीं है। इसका उद्गम सिद्ध और
तांत्रिक परंपराओं में हुआ, जो बाद में नाथ योगियों द्वारा विकसित हुआ। इन परंपराओं में योग को शरीर और
ब्रह्मांड के बीच गहरे संबंध के रूप में देखा गया। विज्ञान भैरव तंत्र जैसे
ग्रंथों में योग की 108 ध्यान विधियाँ हैं, जो इसे सार्वभौमिक और लिंग-जाति निरपेक्ष बनाती हैं।
पतंजलि
ने योग को सूत्रबद्ध कर ‘चित्तवृत्ति निरोध’ को इसका लक्ष्य बताया,
परंतु उनका दृष्टिकोण दार्शनिक रूप से जटिल था। बौद्ध,
जैन और सूफी परंपराओं ने भी योग के ध्यान,
करुणा और जप पर आधारित स्वरूपों को अपनाया।
आज
योग आधुनिक ‘योगा’ में बदल गया है, जो मुख्यतः शारीरिक फिटनेस पर केंद्रित है। यह शहरी जीवनशैली का हिस्सा बन
गया है, जबकि
ग्रामीण जीवन अपने आप में योगमय है।
2015
में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा के बाद योग वैश्विक मंच पर तो पहुँचा,
पर इसके राजनीतिकरण की आलोचना भी हुई। इसलिए आवश्यक है
कि योग को धर्म और राजनीति से परे, एक आंतरिक साधना और मानव-चेतना की सार्वभौमिक पद्धति के रूप में समझा जाए।
केवल ‘योगा’ नहीं, हमें ‘योगः’ की ओर लौटने की आवश्यकता है—जहाँ आत्मा से जुड़ाव है।
Abstract
(Today, yoga is
no longer limited to health or physical exercise—it has become a subject of
social, cultural, and political discourse. Some view it as India’s cultural
heritage, others as a symbol of Hindutva, and yet others see it as a part of
modern medical and wellness practices. On social media and in public debates,
yoga faces both support and criticism.
Historically, yoga
did not originate from any one religion or caste. Its roots lie in Siddha and
Tantric traditions, later refined by Nath yogis. These traditions viewed yoga
as a deep connection between the human body and the cosmos. Texts like the ‘Vigyan
Bhairav Tantra’ describe 108 meditation
techniques, portraying yoga as universal and beyond gender or caste barriers.
Patanjali systematized yoga through the ‘Yoga Sutras’, defining it as
“cessation of the modifications of the mind.” However, his approach was deeply
philosophical and became less accessible to common people. Buddhist, Jain, and
Sufi traditions also adopted forms of yoga, emphasizing meditation, compassion,
and chanting.
In the modern era,
yoga has transformed into “yoga”—a practice focused mainly on physical fitness
and wellness. It has become a part of urban, middle-class lifestyles, whereas
rural and laboring communities often live a yogic life through natural discipline
and daily physical labor.
Since the declaration
of International Yoga Day in 2015, yoga has
gained global recognition. However, its politicization has also sparked
debates, with some seeing it as a cultural assertion and others as a communal
agenda.
Therefore, it is
essential to see yoga beyond religion and politics—as a path of inner
exploration and universal human consciousness. We must move beyond just “yoga”
and return to the essence of “yogah” where the body, mind, and soul unite in
harmony.)
योग कीपर बहस का वर्तमान परिप्रेक्ष्य
वर्तमान समय में योग पर चर्चा एक सतही विमर्श नहीं रह
गया है;
यह गहरे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का विषय बन चुका है।
कोई इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर मानता है, कोई इसे हिन्दुत्व की
पहचान के रूप में देखता है, तो कोई इसे आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान का एक अनिवार्य
हिस्सा। सोशल मीडिया, न्यूज़ चैनल, अकादमिक मंच और
राजनीतिक सभाओं में योग का ज़िक्र या तो गौरवगाथा के रूप में होता है या फिर
आलोचना के शस्त्र के रूप में।
फेसबुक जैसी सोशल साइट्स पर ऐसी टिप्पणियाँ आम हो गई
हैं जैसे—"जब तक योग ब्राह्मणों के हाथ में था, तब तक यह मोक्ष का
मार्ग था;
अब यह सिर्फ़ कसरत है।" यह कथन महज जातिगत आक्षेप नहीं, बल्कि योग के
सामाजिक स्वरूप में आए बदलाव की ओर संकेत करता है। वहीं बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय
मंच पर एक मुस्लिम महिला का यह कथन—"मैं योग करती हूँ, लेकिन मुसलमान
भी हूँ"—योग की उस सार्वभौमिकता को इंगित करता है जो अब धर्मों की
सीमाओं से परे एक मानवीय साधना बन चुकी है।
योग: एक बहुस्तरीय ऐतिहासिक यात्रा
योग का इतिहास किसी एक परंपरा या संप्रदाय से नहीं
जुड़ा है। इसकी उत्पत्ति और विकास वैदिक, अवैदिक, तांत्रिक, बौद्ध, जैन, नाथ, और यहाँ तक कि
इस्लामी सूफ़ी परंपराओं तक फैली हुई है। इसका मूलाधार केवल उपनिषदों या पतंजलि के
सूत्रों में नहीं, बल्कि उससे भी पहले लोक परंपराओं, सिद्ध परंपरा
और तंत्र में है।
योग का उद्गम: सिद्ध से नाथ परंपरा तक
योग के आरंभिक सूत्र सिद्धों और नाथ योगियों में खोजे
जा सकते हैं। सिद्धों ने योग को एक व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि
ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने का सशक्त माध्यम माना। नाथ संप्रदाय के योगियों ने
शरीर को अपवित्र या हीन नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार बताया। उनका यह उद्घोष—
"तुम जानो क्षुद्र जाहा, क्षुद्र ताहा
नय। सत्य येथा किछु याके, विश्व सेथा रय।"
इस बात का प्रमाण है कि योगियों ने शरीर के माध्यम से
ब्रह्मांड को अनुभव किया। उन्होंने शरीर के रहस्यों—छह चक्र, बारह ग्रंथियाँ, तीन नाड़ियाँ
और तंत्रों—को साधना के केंद्र में रखा।
तांत्रिक योग और विज्ञान भैरव तंत्र
योग का एक गूढ़ और समृद्ध पक्ष तांत्रिक परंपरा में है, जहाँ विज्ञान
भैरव तंत्र जैसे ग्रंथों में शिव द्वारा देवी को दिए गए 108 ध्यान सूत्र आज भी
आधुनिक ध्यान विधियों के मूल आधार हैं। ये विधियाँ लिंग, वर्ग या धर्म
की सीमाओं को नहीं मानतीं, बल्कि सभी के लिए समान रूप से उपयोगी हैं।
तंत्र और योग का यह गठबंधन आज भी पश्चिमी ध्यान और
मनोविज्ञान के प्रयोगों में प्रतिबिंबित होता है—चाहे वह माइंडफुलनेस हो या
ट्रान्सेंडेंटल मेडिटेशन। यह पद्धतियाँ स्पष्ट रूप से यह दर्शाती हैं कि योग किसी
धर्म-विशेष की बंदिशों में नहीं बंधा।
योग और पतंजलि: संस्थापन से सीमांकन तक
पतंजलि ने योग को एक व्यवस्थित रूप दिया—‘अष्टांग योग’
के माध्यम से। उनका सूत्र—"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"—योग को एक मानसिक
अनुशासन के रूप में प्रस्तुत करता है। परंतु यह ध्यान देना आवश्यक है कि पतंजलि के
योगसूत्र मूलतः सांख्य दर्शन की पृष्ठभूमि से निकले हैं और आत्मा-परमात्मा के
द्वैत पर आधारित हैं।
पतंजलि का योगदान योग को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में
संस्थापित करना भी था, जिसने इसे आध्यात्मिक शुचिता, नियंत्रण, और जातीय
अनुशासन से जोड़ दिया। यह वह मोड़ था जब योग साधारण जनमानस और स्त्रियों की पहुँच
से धीरे-धीरे दूर होता गया।
योग का बौद्ध संस्करण: ध्यान, करुणा और अजपा
योग की एक और महत्त्वपूर्ण धारा बौद्ध धर्म में विकसित
हुई। पद्मसंभव जैसे महायोगियों ने योग को ध्यान और करुणा का औजार बनाया। बौद्धों
में ‘अजपा जाप’, ‘षडंग योग’, और ‘ध्यानाभ्यास’ का प्रसार हुआ। यहाँ योग शरीर से
अधिक मन और चित्त की गहराइयों में उतरने की विधि बना।
तिब्बती तांत्रिक योग, ज़ेन परंपरा और विपस्सना
all are rooted in these ancient contemplative
practices. इसमें आत्मा और परमात्मा का द्वैत नहीं, बल्कि क्षणिकता, अनित्यत्व और
करुणा का अभ्यास प्रमुख था।
योग और मुस्लिम परंपराएँ: सूफ़ी योग
इस्लामी दुनिया में भी ‘जिक्र’, ‘धिक़्र’, ‘समाअ’ जैसी
सूफ़ी परंपराएँ योग की आंतरिक साधनाओं के समानान्तर हैं। वहाँ भी ध्यान, श्वास और संगीत
के माध्यम से ईश्वर से एकत्व की भावना पाई जाती है। यही कारण है कि आज भी कई
मुस्लिम देश ‘योगा’ को अपनाते हैं, बशर्ते उसमें किसी धार्मिक प्रतीक की अनिवार्यता न हो।
समकालीन योग: योग से योगा तक
आज जो ‘योग’ लोकप्रिय है, वह मुख्यतः ‘योगा’
है—एक शरीर-केंद्रित, जिमनास्टिक-प्रेरित व्यायाम पद्धति। इसमें ‘स्व’ की
खोज नहीं,
‘फिटनेस’ की खोज है। यह योग का केवल बाह्य आवरण है—‘पूर्वक्रिया’। बाबा
रामदेव,
श्री श्री रविशंकर, और अन्य योगगुरुओं ने इसी योगा को आधुनिक जीवनशैली के
अनुसार प्रचारित किया है।
इसका सबसे बड़ा बाज़ार मध्यमवर्गीय, शहरी, सुविधा-संपन्न
वर्ग है,
जो दफ्तर के तनाव, मोटापे, उच्च रक्तचाप और अनिद्रा के समाधान के लिए योगा को
अपनाता है। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि ग्रामीण जीवन स्वयं में ही योगमय है—उनकी
श्रम-साधना,
प्रातः जागरण, भोजन, नींद और सामाजिक तालमेल योग के सिद्धांतों के अनुरूप
हैं।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: गौरव या राजनीति?
2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त
राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा और उसे अभूतपूर्व समर्थन मिला, तो यह भारत की
सांस्कृतिक कूटनीति की विजय मानी गई। परंतु इसके साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या यह
एक धार्मिक राष्ट्रवाद का आयाम नहीं ले रहा?
इस कदम की सराहना भी हुई और आलोचना भी—सराहना इसलिए कि
भारत ने अपनी परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित किया; आलोचना इसलिए कि इसे
हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रचार के रूप में देखा गया। वामपंथी और मुस्लिम
संगठनों को आशंका हुई कि योग के नाम पर एक सांस्कृतिक एकरूपता थोपी जा रही है।
योग: आध्यात्मिक विमर्श या सत्ता का प्रतीक?
आज योग एक सांस्कृतिक ब्रांड बन गया है—‘योगा फॉर
वेलनेस’,
‘योगा फॉर ब्यूटी’, ‘योगा फॉर पॉलिटिक्स’। इस रूप में यह आत्मबोध से दूर
होता जा रहा है और ‘सत्ता-बोध’ का माध्यम बनता जा रहा है।
जो साधना कभी शरीर को साधकर आत्मा से जुड़ने का माध्यम
थी,
वह अब इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ और ‘सिक्स-पैक’ दिखाने का
उपकरण बन चुकी है।
उपसंहार: योग की ओर पुनरागमन
अब आवश्यकता है कि हम ‘योगा’ की चमक से ऊपर उठकर
‘योगः’ की शांति की ओर लौटें। योग किसी धर्म, जाति, लिंग या
राष्ट्र की संपत्ति नहीं—यह एक मानव चेतना की सार्वभौमिक साधना है। यह एक तकनीक
नहीं,
दर्शन है; केवल व्यायाम नहीं, आत्म-साक्षात्कार का
मार्ग है।
भारत यदि इस योग परंपरा को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित
कर पा रहा है तो यह स्वागत योग्य है। किंतु हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हम
योग को बाज़ार, राजनीति या पंथ की सीमाओं में सीमित न कर दें।
योग न हिन्दू है, न मुस्लिम, न आधुनिक, न पुरातन—यह
शाश्वत है। यह एक ऐसा ‘संयोजन’ है, जहाँ शरीर, मन, आत्मा और ब्रह्म एकसूत्र में जुड़ते हैं।
यहाँ आपके विस्तृत लेख के लिए एक उपयुक्त संदर्भ ग्रंथ
सूची (Reference Bibliography) दी जा रही है, जिसमें
शास्त्रीय ग्रंथों, आधुनिक अनुसंधानों, लेखों और प्रमुख
विचारकों की कृतियों का समावेश है। यह सूची आपको लेख को अधिक प्रमाणिक और शोधपरक
रूप देने में मदद करेगी।
प्राचीन और
शास्त्रीय ग्रंथ:
1.
पतंजलि योगसूत्र — महर्षि पतंजलि(मुख्य सूत्र: योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः, अष्टांग योग)
2. भगवद्गीता
— श्रीकृष्ण का योग-दर्शन (अध्याय 6: ध्यानयोग)
3. शिव
संहिता — तांत्रिक योग और नाड़ी-चक्र तंत्र का वर्णन
4. गोरखनाथ
की वाणी — नाथ संप्रदाय में हठयोग की परंपरा
5. विज्ञान
भैरव तंत्र — कश्मीरी शैव तंत्र पर आधारित 112 ध्यान विधियाँ
6. हठयोग
प्रदीपिका — स्वात्माराम योगी द्वारा रचित योगशास्त्र
7. योग
वासिष्ठ — अद्वैत वेदांत और ध्यान का गूढ़ ग्रंथ
8. तिब्बती
योग और गुप्त सिद्धियाँ — टुल्कु थोनडुप
9. पद्मसंभव
की योग साधना — तिब्बती निंगमा परंपरा से
10. सूफी
मार्ग और ध्यान — हज़रत इनायत ख़ान
11. योग
का इतिहास — सुरेंद्रनाथ दासगुप्त
12. योग:
स्वतंत्रता की ओर एक विज्ञान — ओशो (रजनीश)
13. द
हर्ट ऑफ योगा (The Heart of Yoga) — टी.के.वी. देसिकाचार
14. योग
बॉडी: द ओरिजिन्स ऑफ मॉडर्न पोस्टर प्रैक्टिस — मार्क सिंगलटन
15. फ्रॉम
योग टू योगा — जोसेफ एल्ट्सर
16. बीबीसी
हिंदी पर "मैं योग करती हूँ लेकिन मैं मुसलमान भी हूँ" –
लेख, बीबीसी हिंदी, 2022
17. फ़र्स्टपोस्ट, द वायर, स्क्रोल.इन पर
प्रकाशित योग और राजनीति पर लेख
18. अंतरराष्ट्रीय
योग दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महासभा के वक्तव्य (2014)
19. AYUSH मंत्रालय (भारत
सरकार) द्वारा प्रकाशित योग पुस्तिकाएँ
20. भारतीय
योग संस्थान (Bihar School of Yoga) – श्री स्वामी
सत्यानंद सरस्वती
अन्य प्रासंगिक संदर्भ:
21. योग
और धर्मनिरपेक्षता — रमेश ठाकुर, भारत-कोष
22. योग, राजनीति और
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद — डॉ. प्रभात पटनायक
0 Comments