राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट मे आयुष का हिस्सा

Public Discourse

Date : 22 September 2025

Author :Achal Pulastey


आयुर्वेद दिवस पर विशेष 

 राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस और आयुर्वेद का वैश्विक अवसर

भारत आज एक विचित्र स्वास्थ्य–विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक ओर आधुनिक चिकित्सा तकनीक, सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल और फार्मास्यूटिकल उद्योग का अभूतपूर्व विस्तार है; दूसरी ओर एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR), जीवनशैली जनित रोग, कुपोषण और ग्रामीण स्वास्थ्य–असमानता की गहराती चुनौती है। ऐसे समय में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है कि क्या हमारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति भारत की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की GLASS (2024) रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि भारत एंटीबायोटिक खपत (13–14 DDD प्रति 1000 व्यक्ति प्रतिदिन) और AMR दोनों में अग्रणी देशों में है। The Lancet (2023) के अनुसार 2019 में विश्वभर में लगभग 50 लाख मौतें AMR से जुड़ी थीं, जिनमें से 2.9 लाख से अधिक भारत में हुईं। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2050 तक स्थिति और भयावह हो सकती है। यह संकट केवल चिकित्सकीय नहीं, बल्कि नीति और अनुसंधान की दिशा से भी जुड़ा हुआ है।

विडम्बना यह है कि जिस देश की 60–70% आबादी आज भी किसी न किसी रूप में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर निर्भर है, उसकी स्वास्थ्य नीति का केन्द्रीय ढांचा आयातित मॉडल पर आधारित है। 2024–25 के बजट में कुल स्वास्थ्य आवंटन लगभग ₹85,244 करोड़ था, जिसमें आयुष का हिस्सा मात्र 3.3% रहा। 2025–26 में स्वास्थ्य बजट में 20% वृद्धि के बावजूद आयुष की हिस्सेदारी लगभग 3.7–3.8% ही बनी रही। यह अनुपात उस वास्तविक सामाजिक निर्भरता और संभावनाओं के अनुपात में अत्यंत कम है।

आयुर्वेद और अन्य आयुष पद्धतियाँ केवल “वैकल्पिक चिकित्सा” नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली, आहार-विहार और पारिस्थितिकी से जुड़ी समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती हैं। उत्तर भारत का आयुर्वेद, दक्षिण का सिद्ध, हिमालयी सोवारिंग्पा और आदिवासी क्षेत्रों की लोक-चिकित्सा—ये सब स्थानीय संसाधनों और प्रकृति-आधारित ज्ञान पर आधारित स्वास्थ्य मॉडल हैं। यह विविधता भारत की शक्ति है, कमजोरी नहीं।

विशेष रूप से AMR संकट के संदर्भ में आयुर्वेद के लिए एक वैश्विक अवसर उपस्थित है। जब एंटीबायोटिक दवाएँ निष्प्रभावी हो रही हैं और सुपरबग का खतरा बढ़ रहा है, तब हर्बल-नैनो तकनीक, रसायन-आधारित औषधियाँ, फेज थेरैपी जैसे नवाचारों के साथ आयुर्वेद को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। इसके लिए बहु-विषयी सहयोग आवश्यक है—बायोकेमिस्ट्री, वनस्पति विज्ञान, रसायन विज्ञान, नैनो टेक्नोलॉजी और सूचना प्रौद्योगिकी के साथ आयुर्वेदिक संस्थानों का समन्वय।

राष्ट्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CDRI), राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (NCL) और विश्वविद्यालयों को आयुर्वेदिक महाविद्यालयों के साथ संयुक्त शोध मंच तैयार करने चाहिए। निजी क्षेत्र में कार्यरत अनुभवी एलोपैथी और आयुर्वेद चिकित्सकों की सहभागिता इस समन्वय को व्यावहारिक आधार दे सकती है।

परंतु यह सब केवल घोषणाओं से संभव नहीं। आवश्यकता है—

1.आयुर्वेदिक शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता उन्नयन की।

2.औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण और संवर्धन की राष्ट्रीय नीति की।

3.आयुष के लिए स्वास्थ्य बजट में कम से कम 10% भागीदारी सुनिश्चित करने की।

4.महामारी और आपदा प्रबंधन में आयुष की स्पष्ट और विधिक भूमिका निर्धारित करने की।

भारत की स्वास्थ्य चुनौतियाँ दो छोरों पर खड़ी हैं—एक ओर समृद्ध वर्ग के जीवनशैली रोग (डायबिटीज, हृदयरोग), दूसरी ओर वंचित वर्ग का कुपोषण और संक्रमण। आयुर्वेद की समग्र दृष्टि इन दोनों के बीच सेतु बन सकती है।

आज समय आ गया है कि भारत “आयातित स्वास्थ्य मॉडल” की निर्भरता से आगे बढ़कर अपनी पारंपरिक चिकित्सा विरासत को वैज्ञानिक आधार पर पुनर्संगठित करे। यदि ऐसा किया गया, तो आयुर्वेद न केवल राष्ट्रीय स्वास्थ्य संतुलन स्थापित कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य बाजार में भारत को अग्रणी भूमिका भी दिला सकता है।

स्वास्थ्य केवल बाजार का विषय नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा है। भारत को अपनी आत्मा की ओर लौटना ही होगा। 


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1 Comments

Anonymous said…
हर बार की तरह ईस्टर्न साइंटिस्ट का यह अंक भी शानदार और संग्रहणीय है। संपादक मण्डल व लेखको को बधाई।