अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस: अचल पुलस्तेय की यात्रिकी "कुरुना से कामाख्या" का एक अंश

Public Discourse | Eastern Scientist

अन्तर्राष्टीय महिला दिवस पर अचल पुलस्तेय की यात्रा कथा " कुरुना से कामाख्या" का यह अंश महिला अस्तित्व व स्वतंत्र के संदर्भ में गहराई से सोचने को विविश करता है।-संपादक


उस देश में जहाँ महाकाली आदि स्त्री है। सदियाँ लगीं होगीं, अदि स्त्री को लक्ष्मी बनाने में । न जाने कितनी स्तुतियाँ गायी गयी होगी,तब तैयार हुई होगी विष्णु का पाँव दबाने के लिए । न जाने कितने श्रृंगार, आभरणों से लुभाया गया होगा,तब तैयार हुई होगी घर बसाने के लिए। शायद अंतिम अस्त्र जननी होने का आत्म सम्मोह रहा होगा,जिससे वह अकिंचन,अबला बनना चुना होगा। फिर अवतार अग्निदाह, हरण, अग्नि परीक्षा, वनवास,बिरह भोगने को विवश हुई होगी। अन्यथा वह तो प्रबला,स्वतंत्र आद्या शक्ति थी,जो पाँव रख कर खड़ी थी अट्टहास करती शिव के सीने पर या समानान्तर बैठी थी साम्यावस्था में आदि पुरुष शिव से आँखें मिलती हुई । शायद इसीलिए साम्या, समया भी कहा गया है उसे । भाव उपजे होगें मन में प्रणय,स्नेह के और बन गयी होगी अबला । साजिश रचा होगा किसी देवता नामी आदमी ने,भोग्या बनाने के लिए उसे, संहितायें, स्मृतियाँ लिखा होगा,सदा उसे पुरुष संरक्षण में रहने के लिए। सुचिता थोपी गयी होगी चरित्र की,लांक्षना से डराया गया होगा। जिसका परिणाम आज लड़ाकी लड़कियों के हताशा के रुप में प्रत्यक्ष हो रहा है। लेकिन नहीं, कभी-कभी जाग जाता है उसका आदिम स्वभाव और उठा लेती है हथियार,तब बन जाती है आत्म रक्षिका फूलन,पुतली बाई,लक्ष्मीबाई

 

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