आदिवासी : आधा सच, पूरा सच

Public Discourse
9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष

                                                   -अचल पुलस्तेय*



"आदिवासी" शब्द सुनते ही गैर-आदिवासी, तथाकथित विकसित समाज के मन में अक्सर एक पूर्वनिर्मित छवि उभर आती है—नंगे, जंगली, तीर-धनुष लिए, संसाधनों से वंचित, गरीब, कम बुद्धि, कम मजदूरी पर सड़क या ईंट-भट्टों में काम करने वाले, अशिक्षित, काले और असभ्य लोग। यह छवि पूरी तरह झूठ नहीं है, पर पूरी तरह सच भी नहीं। दरअसल, मुख्यधारा की मीडिया, साहित्य, सिनेमा और धारावाहिकों ने आदिवासी समुदाय को इसी अधूरी तस्वीर में पेश किया है।

सच का दूसरा और बड़ा हिस्सा यह है कि पश्चिमी विकास मॉडल, पूँजीवाद और तथाकथित सभ्य समाज ने ही आदिवासी समुदाय को इस स्थिति तक पहुँचाया है। आज जिन बड़े शहरों, चौड़ी सड़कों और उद्योगों को हम विकास का प्रतीक मानते हैं, वे आदिवासी क्षेत्रों की समृद्धि की लूट पर खड़े हैं। सीमेंट, लकड़ी, एल्यूमिनियम, ताँबा, सोना, लोहा, चाँदी, अभ्रक, कोयला, पेट्रोलियम—ये सभी वे संसाधन हैं, जिन्हें आदिवासियों से छीना गया। हजारों वर्षों तक उनके पूर्वज इन संसाधनों को सुरक्षित रखते आए थे, लेकिन आज उन्हें उनके ही जल-जंगल-जमीन से उजाड़कर सस्ते श्रमिक बनने पर मजबूर किया जा रहा है।

इतिहास का आधा सच

स्वतंत्रता के समय भारत में 256 आदिवासी रियासतों का लोकतंत्र में सबसे पहले विलय हुआ। मध्य भारत में महाराजा संग्राम साह मारावी के पूर्वजों और वंशजों ने लगभग 1400 वर्षों तक शासन किया। रानी दुर्गावती इसी वंश की बहू थीं। पूर्वोत्तर और बंगाल-असम में कोच या राजबोग्सी जनजाति का वृहद् कामता साम्राज्य था, जिसमें पूर्वी बिहार, बंगाल, असम और वर्तमान बांग्लादेश तक शामिल थे।

स्वतंत्रता संग्राम में नागालैंड की रानी गाइडिल्यू, टांट्या भील, शंकरसाह, रघुनाथ साह, बिरसा मुंडा जैसे अनेकों आदिवासी वीरों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। पूर्वोत्तर की नागा जनजाति आज विकास की मुख्यधारा के समानांतर खड़ी है, जबकि मिजोरम की पुई समेत 16 जनजातियाँ 100% साक्षरता हासिल कर चुकी हैं। यह तथाकथित मुख्यधारा से अपेक्षा करता है कि वह आदिवासी समुदाय के बारे में अपनी संकीर्ण धारणाएँ बदले।

जहाँ तक सुन्दरता की बात है तो पूर्वोत्तर के मेच,कोच,पुई,रालते,नागा,कूकी आदिवासियों के सौन्दर्य का कोई जवाब नहीं है। इसका रंग गोरा होता है।

विश्व आदिवासी दिवस : क्यों और कब?

9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि 1982 में इसी दिन जिनेवा में आदिवासी जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र कार्यसमूह (UN Working Group on Indigenous Populations) की पहली बैठक हुई थी। इस दिवस का उद्देश्य विश्वभर में आदिवासी समुदायों के अधिकारों, संस्कृति, पहचान और योगदान का सम्मान करना और उनके मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।

भारत के आदिवासी समुदाय : एक परिचय

भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में आदिवासी समुदाय एक प्राचीन और महत्वपूर्ण अंग हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% (10 करोड़ से अधिक) लोग अनुसूचित जनजातियों के अंतर्गत आते हैं।

भौगोलिक वितरण:

  • पूर्वी और मध्य भारत: झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश
  • उत्तर-पूर्व: असम, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा
  • दक्षिण भारत: केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश
  • उत्तर और पश्चिम: राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात

प्रमुख जनजातियाँ:

  • मध्य/उत्तर भारत: गोंड, संथाल, भील, मुंडा, उरांव, बैगा, कोरकू, भोक्सा, भूटिया, थारू, खरवार
  • उत्तर-पूर्व: नागा, मिजो, गारो, खासी, अपतानी, बोडो, पुई, लालुंग, कोच, मेच
  • दक्षिण भारत: टोडा, कोटा, कुरुंबा, इरुला, चेंचु
  • राजस्थान-गुजरात: भील, मीणा, गरासिया, डांगी

जीवन-शैली और संस्कृति:

  • आर्थिक गतिविधियाँ: शिकार-संग्रह, झूम खेती, पशुपालन, वनों से उत्पाद संग्रह, पारंपरिक कृषि
  • भाषाएँ: द्रविड़, ऑस्ट्रो-एशियाटिक, तिब्बती-बर्मन और इंडो-आर्य
  • धार्मिक मान्यताएँ: प्रकृति-पूजा, टोटेमवाद, पूर्वज-पूजा, साथ ही हिंदू, ईसाई, बौद्ध प्रभाव
  • कला और परंपरा: लोकगीत, नृत्य, मुखौटा कला, गोंड पेंटिंग, पिथोरा चित्रकला, लकड़ी की नक्काशी

अंतिम बात

आज विश्व आदिवासी दिवस पर मुख्यतः आदिवासी समुदाय ही उत्सव मना रहे हैं। तथाकथित सभ्य समाज, जिसने उनकी भूमि, संसाधनों और संस्कृति पर कब्जा कर अपनी समृद्धि गढ़ी, इस दिन से लगभग अनजान है। यह न केवल विडंबना है, बल्कि हमारी सामूहिक नैतिक विफलता भी। यदि हम सच में लोकतंत्र और सभ्यता की बात करते हैं, तो हमें इस सच को स्वीकार करना और बदलना होगा।

(*लेखक-ईस्टर्न साइंटिस्ट के मुख्य संपादक एवं लेखक,विचारक,कवि,कथाकार,लोकअध्ययन के विद्वान है)

 

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