आदिवासी : आधा सच, पूरा सच

Public Discourse

Date : 09 August 2025
Author : Achal Pulastey


9 अगस्त : विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष                                               



"आदिवासी" शब्द सुनते ही गैर-आदिवासीतथाकथित विकसित समाज के मन में अक्सर एक पूर्वनिर्मित छवि उभर आती है—नंगेजंगलीतीर-धनुष लिएसंसाधनों से वंचितगरीबकम बुद्धिकम मजदूरी पर सड़क या ईंट-भट्टों में काम करने वालेअशिक्षितकाले और असभ्य लोग। यह छवि पूरी तरह झूठ नहीं हैपर पूरी तरह सच भी नहीं। दरअसलमुख्यधारा की मीडियासाहित्यसिनेमा और धारावाहिकों ने आदिवासी समुदाय को इसी अधूरी तस्वीर में पेश किया है।

सच का दूसरा और बड़ा हिस्सा यह है कि पश्चिमी विकास मॉडलपूँजीवाद और तथाकथित सभ्य समाज ने ही आदिवासी समुदाय को इस स्थिति तक पहुँचाया है। आज जिन बड़े शहरोंचौड़ी सड़कों और उद्योगों को हम विकास का प्रतीक मानते हैंवे आदिवासी क्षेत्रों की समृद्धि की लूट पर खड़े हैं। सीमेंटलकड़ीएल्यूमिनियमताँबासोनालोहाचाँदीअभ्रककोयलापेट्रोलियम—ये सभी वे संसाधन हैंजिन्हें आदिवासियों से छीना गया। हजारों वर्षों तक उनके पूर्वज इन संसाधनों को सुरक्षित रखते आए थेलेकिन आज उन्हें उनके ही जल-जंगल-जमीन से उजाड़कर सस्ते श्रमिक बनने पर मजबूर किया जा रहा है।

इतिहास का आधा सच

स्वतंत्रता के समय भारत में 256 आदिवासी रियासतों का लोकतंत्र में सबसे पहले विलय हुआ। मध्य भारत में महाराजा संग्राम साह मारावी के पूर्वजों और वंशजों ने लगभग 1400 वर्षों तक शासन किया। रानी दुर्गावती इसी वंश की बहू थीं। पूर्वोत्तर और बंगाल-असम में कोच या राजबोग्सी जनजाति का वृहद् कामता साम्राज्य थाजिसमें पूर्वी बिहारबंगालअसम और वर्तमान बांग्लादेश तक शामिल थे।

स्वतंत्रता संग्राम में नागालैंड की रानी गाइडिल्यूटांट्या भीलशंकरसाहरघुनाथ साहबिरसा मुंडा जैसे अनेकों आदिवासी वीरों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। पूर्वोत्तर की नागा जनजाति आज विकास की मुख्यधारा के समानांतर खड़ी हैजबकि मिजोरम की पुई समेत 16 जनजातियाँ 100% साक्षरता हासिल कर चुकी हैं। यह तथाकथित मुख्यधारा से अपेक्षा करता है कि वह आदिवासी समुदाय के बारे में अपनी संकीर्ण धारणाएँ बदले।

जहाँ तक सुन्दरता की बात है तो पूर्वोत्तर के मेच,कोच,पुई,रालते,नागा,कूकी आदिवासियों के सौन्दर्य का कोई जवाब नहीं है। इसका रंग गोरा होता है।

विश्व आदिवासी दिवस : क्यों और कब?

अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस इसलिए मनाया जाता है क्योंकि 1982 में इसी दिन जिनेवा में आदिवासी जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र कार्यसमूह (UN Working Group on Indigenous Populations) की पहली बैठक हुई थी। इस दिवस का उद्देश्य विश्वभर में आदिवासी समुदायों के अधिकारोंसंस्कृतिपहचान और योगदान का सम्मान करना और उनके मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।

भारत के आदिवासी समुदाय : एक परिचय

भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में आदिवासी समुदाय एक प्राचीन और महत्वपूर्ण अंग हैं। 2011 की जनगणना के अनुसारदेश की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6% (10 करोड़ से अधिक) लोग अनुसूचित जनजातियों के अंतर्गत आते हैं।

भौगोलिक वितरण:

  • पूर्वी और मध्य भारत: झारखंडछत्तीसगढ़ओडिशामध्य प्रदेशमहाराष्ट्रआंध्र प्रदेश
  • उत्तर-पूर्व: असममिजोरमनागालैंडमेघालयमणिपुरअरुणाचल प्रदेशत्रिपुरा
  • दक्षिण भारत: केरलतमिलनाडुकर्नाटकआंध्र प्रदेश
  • उत्तर और पश्चिम: राजस्थानहिमाचल प्रदेशउत्तराखंडगुजरात

प्रमुख जनजातियाँ:

  • मध्य/उत्तर भारत: गोंडसंथालभीलमुंडाउरांवबैगाकोरकूभोक्साभूटियाथारूखरवार
  • उत्तर-पूर्व: नागामिजोगारोखासीअपतानीबोडोपुईलालुंगकोचमेच
  • दक्षिण भारत: टोडाकोटाकुरुंबाइरुलाचेंचु
  • राजस्थान-गुजरात: भीलमीणागरासियाडांगी

जीवन-शैली और संस्कृति:

  • आर्थिक गतिविधियाँ: शिकार-संग्रहझूम खेतीपशुपालनवनों से उत्पाद संग्रहपारंपरिक कृषि
  • भाषाएँ: द्रविड़ऑस्ट्रो-एशियाटिकतिब्बती-बर्मन और इंडो-आर्य
  • धार्मिक मान्यताएँ: प्रकृति-पूजाटोटेमवादपूर्वज-पूजासाथ ही हिंदूईसाईबौद्ध प्रभाव
  • कला और परंपरा: लोकगीतनृत्यमुखौटा कलागोंड पेंटिंगपिथोरा चित्रकलालकड़ी की नक्काशी

अंतिम बात

आज विश्व आदिवासी दिवस पर मुख्यतः आदिवासी समुदाय ही उत्सव मना रहे हैं। तथाकथित सभ्य समाजजिसने उनकी भूमिसंसाधनों और संस्कृति पर कब्जा कर अपनी समृद्धि गढ़ीइस दिन से लगभग अनजान है। यह न केवल विडंबना हैबल्कि हमारी सामूहिक नैतिक विफलता भी। यदि हम सच में लोकतंत्र और सभ्यता की बात करते हैंतो हमें इस सच को स्वीकार करना और बदलना होगा।

(*लेखक-ईस्टर्न साइंटिस्ट के मुख्य संपादक एवं लेखक,विचारक,कवि,कथाकार,लोकअध्ययन के विद्वान है)

 


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