गिरोहबंद पूँजीवाद : शिक्षा पर फासीवादी हमला✒️

Public Discourse

Date : 07 February 2026

- डॉ. चतुरानन ओझा

प्रदेश सह संयोजक-समान शिक्षा अधिकार मंच (उप्र)


लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनावों में नहींबल्कि शिक्षा में होती है। जब शिक्षा प्रश्न पूछने के बजाय आज्ञाकारिता सिखाने लगेतब लोकतंत्र भीतर से क्षीण होने लगता है। हेनरी ए. गिरू की गिरोहबंद पूँजीवाद की अवधारणा यह समझने में मदद करती है कि कैसे नवउदारवादसांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राज्य-सत्ता मिलकर शिक्षामीडिया और सार्वजनिक विवेक को अनुशासित करते हैं। भारतीय संदर्भ में यह संकट और गहरा है। Eastern Scientist इस लेख को शिक्षा और लोकतंत्र पर एक आवश्यक वैचारिक हस्तक्षेप मानता है।— संपादक Eastern Scientist     



समकालीन विश्व के सबसे महत्वपूर्ण आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्री अमेरिकन  सांस्कृतिक सिद्धांतकार हेनरी ए. गिरू ने अमेरिकन एजुकेशनल रिसर्च एसोसिएशन, शिकागो (2023)Gangster Capitalism and the Politics of Fascist Education”  विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि हमारे समय के उस गहरे संकट की पहचान करता हैजिसे प्रायः केवल आर्थिक असमानता या राजनीतिक ध्रुवीकरण तक सीमित कर दिया जाता है। गिरू स्पष्ट करते हैं कि समकालीन नवउदारवादी पूँजीवाद अब महज़ एक आर्थिक प्रणाली नहीं रहाबल्कि वह एक ऐसी हिंसक राजनीतिक–सांस्कृतिक संरचना में बदल चुका हैजो लोकतंत्र की बुनियादी शर्तों—शिक्षानागरिक चेतना और आलोचनात्मक विवेक—को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर रही है।

यह लेख इस तथ्य को रेखांकित करता है कि नवउदारवाद अपने ही वादों—समानतासामाजिक गतिशीलता और कल्याण—को पूरा करने में असफल हो चुका है। इस वैधता-संकट से उबरने के लिए उसने नव-फासीवाद के साथ गठजोड़ किया है। नस्लवादबहुसंख्यकवादश्वेत सर्वोच्चताधार्मिक राष्ट्रवाद और ‘त्याज्यता की राजनीति’ इस गठजोड़ के प्रमुख औज़ार हैं। इस प्रक्रिया में हिंसा को राजनीतिक भाषा और घृणा को सार्वजनिक विमर्श के रूप में सामान्यीकृत किया जा रहा है।

गिरू विशेष रूप से इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शिक्षा आज फासीवादी राजनीति का केंद्रीय निशाना बन चुकी है। कारण स्पष्ट है—आलोचनात्मक शिक्षा केवल ज्ञान का प्रसार नहीं करतीवह प्रश्न करनेइतिहास को समझने और सत्ता को जवाबदेह ठहराने की क्षमता पैदा करती है। इसी कारण पाठ्यक्रमों की सेंसरशिपपुस्तकों पर प्रतिबंधइतिहास के शुद्धिकरण और आलोचनात्मक सिद्धांतों को ‘ख़तरा’ बताकर हटाने की प्रवृत्ति तेज़ हुई है। शिक्षा को नागरिक निर्माण के लोकतांत्रिक साधन से बदलकर ‘आज्ञाकारी और अनुकूल’ नागरिक गढ़ने की मशीन में तब्दील किया जा रहा है।

यद्यपि गिरू का विश्लेषण अमेरिकी संदर्भ में केंद्रित हैलेकिन इसका निहितार्थ वैश्विक है। भारत सहित वैश्विक दक्षिण के देशों में भी शिक्षा का बाज़ारीकरणज्ञान का निजीकरणविश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला और असहमति का अपराधीकरण—इसी गैंगस्टर पूँजीवादी तर्क का विस्तार है। यहाँ भी शिक्षा को कौशलप्रशिक्षण और रोजगार तक सीमित करउसके आलोचनात्मक और लोकतांत्रिक आयाम को हाशिये पर धकेला जा रहा है।

वास्तव में शिक्षा कोई तटस्थतकनीकी या केवल नीतिगत प्रश्न नहीं है। यह एक सभ्यतागत और लोकतांत्रिक संघर्ष है। जिस समाज में शिक्षा सोचने से डरने लगेवहाँ लोकतंत्र केवल संस्थाओं का नाम रह जाता है—उसकी आत्मा नष्ट हो जाती है।

गिरू का लेख हमें चेतावनी देता है कि यदि शिक्षा को बचाया नहीं गया, तो नागरिकता, लोकतंत्र और भविष्य—तीनों संकट में पड़ जाएँगे। साथ ही यह लेख एक आह्वान भी है—कि आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र, बौद्धिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विवेक की रक्षा को राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में पुनः स्थापित किया जाए।


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