सारांश
अथर्ववेद के ऋषि दीर्घ आयु की कामना भी करते हैं तो पूरे समाज के लिए न कि मात्र स्वयंम् के लिए। व्यक्तिगत वेदना की अभिव्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से करते हैं। इस तरह से वे अपनी पीड़ा में सभी को भागीदार बना लेते हैं। इससे एक लाभ यह है कि प्रत्येक पीड़ा में समाज की पूरी भागीदारी होती है। जिससे वह स्वभावतः उसके निवारण में भी सहायक बनता है। समष्टि में व्यष्टि और व्यष्टि में समष्टि ही लोक का मूल मंत्र है। अथर्ववेदीय चिकित्सा सूत्रों में रोगों से मुक्ति के साथ पर्यावरण से मानवीय सम्बन्ध, भौतिक उन्नति, वनस्पति और मानव में मित्रता, शरीर का सर्वांग अध्ययन,अंग-अंग के द्वारा सर्वांग तक पहुँच की कामना और औषधियों में दिव्य शक्तियों के आह्वान से रोगी और चिकित्सक की मानसिक शक्ति को सबल करने प्रयास भी है।
अथर्ववेद में रोगों से लड़ने के लिए जो मन्त्र मिलते हैं उनकी निम्नलिखित विशेषता स्पष्टतः दिखाई देतीं हैं।
1- निकट पर्यावरण से मानवीय सम्बन्ध की दृढ़ता
2-जीवन में भौतिक उन्नति
3-वनस्पति औषधियों का समुचित प्रयोग
4-वनस्पति और मानव में मित्रता की स्थापना
5-मानव शरीर का सर्वांग अध्ययन
6-अंग-अंग के द्वारा सर्वांग तक पहुँच
7-औषधियों का ज्ञान
8-औषधियों में दिव्य शक्तियों का आह्वान
9-रोगी की मानसिक शक्ति को जगाना
10-चिकित्सक की मानसिक शक्ति को दृढ़ करना
11-जीवन के प्रति मोह होते हुए भी मृत्यु की स्थिति को स्वीकार करना
12-तन और मन का आत्मिक आनन्द से जुड़ाव
एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम् ।।अवे.1.11.6।
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