अथर्ववेद के ऋषि दीर्घ आयु की कामना भी करते हैं तो पूरे समाज के लिए न कि मात्र स्वयंम् के लिए। व्यक्तिगत वेदना की अभिव्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से करते हैं। इस तरह से वे अपनी पीड़ा में सभी को भागीदार बना लेते हैं। इससे एक लाभ यह है कि प्रत्येक पीड़ा में समाज की पूरी भागीदारी होती है। जिससे वह स्वभावतः उसके निवारण में भी सहायक बनता है। समष्टि में व्यष्टि और व्यष्टि में समष्टि ही लोक का मूल मंत्र है। अथर्ववेदीय चिकित्सा सूत्रों में रोगों से मुक्ति के साथ पर्यावरण से मानवीय सम्बन्ध, भौतिक उन्नति, वनस्पति और मानव में मित्रता, शरीर का सर्वांग अध्ययन,अंग-अंग के द्वारा सर्वांग तक पहुँच की कामना और औषधियों में दिव्य शक्तियों के आह्वान से रोगी और चिकित्सक की मानसिक शक्ति को सबल करने प्रयास भी है।
अथर्वेदीय ऋषि तपोवनवासी गम्भीर चिन्तक नहीं, अपितु जीवन से जुड़े वे सरल मानस भोले मानव थे जो न केवल जीने में अपितु अच्छी तरह से जीने में विश्वास रखते थे। लोक की यह विशेषता होती है कि वे अपनी भावनाओं को छिपाने मे विश्वास नहीं रखते, यदि वे दीर्घ आयु की कामना भी करते है तो पूरे समाज के लिए न कि मात्र स्वयम् के लिए । यही नहीं यदि उनकी वेदना व्यक्तिगत होती है तब भी उसकी अभिव्यक्ति सार्वजनिक होती है। इस तरह से वे अपनी पीड़ा में सभी को भागीदार बना लेते हैं। इससे एक लाभ यह है कि प्रत्येक पीड़ा में समाज की पूरी भागीदारी होती है। जिससे वह स्वभावतः उसके निवारण में भी सहायक बनता है। समष्टि में व्यष्टि और व्यष्टि में समष्टि ही लोक का मूल मंत्र है। इसके विपरीत मानव ज्यों-ज्यों लोक से कटता जाता है त्यों-त्यों अन्तर्मुखी होता जाता है। वह न तो अपने सुख में किसी को भागीदार बनाता है न ही दुख में । समाज उसके लिए बन्धन बन जाता है । उसकी पीडाएं भी व्यक्तिगत बन जाती हैं। उनसे छुटकारा पाने के लिए उसे एकान्त की कामना होती है। यह अन्तर वेद और उपनिषदों स्पष्ट दिखाई देता है । अथर्ववेद के मन्त्रों की सरलता इस बात की पुष्टि करती है कि इस वेद के ऋषि लोक चिन्तक थे। यद्यपि इसका यह तात्पर्य नहीं कि इस वेद में गम्भीर चिन्तन ही नहीं । वास्तविकता तो यह है कि इसमें काल विशेष की सम्पूर्ण चिन्तन धारा सन्निहित है । जिसमें लोक चिन्तन के साथ-साथ लोक की दृष्टि से परम शक्तियों को भी कोशिश की गई है । सबसे प्रमुख विशेषता है जीवन की वेदना के प्रति मनोवैज्ञानिक पहुँच और उससे लडने की प्रवृत्ति ।
अथर्ववेद में रोगों से लड़ने के लिए जो मन्त्र मिलते हैं उनकी निम्नलिखित विशेषता स्पष्टतः दिखाई देतीं हैं।
1- निकट पर्यावरण से मानवीय सम्बन्ध की दृढ़ता
2-जीवन में भौतिक उन्नति
3-वनस्पति औषधियों का समुचित प्रयोग
4-वनस्पति और मानव में मित्रता की स्थापना
5-मानव शरीर का सर्वांग अध्ययन
6-अंग-अंग के द्वारा सर्वांग तक पहुँच
7-औषधियों का ज्ञान
8-औषधियों में दिव्य शक्तियों का आह्वान
9-रोगी की मानसिक शक्ति को जगाना
10-चिकित्सक की मानसिक शक्ति को दृढ़ करना
11-जीवन के प्रति मोह होते हुए भी मृत्यु की स्थिति को स्वीकार करना
12-तन और मन का आत्मिक आनन्द से जुड़ाव
एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम् ।।अवे.1.11.6।
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